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वेदवाणी

    यजुर्वेद में ग्रहों से सम्बन्धित ऋचाएं - क्रमशः -1 

    सूर्य- ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् (यजु. 33। 43, 34। 31) 

    चन्द्र- ॐ इमं देवा असपत्नं सुवध्यं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठ्याय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय। इमममुष्य पुत्रममुष्ये पुत्रमस्यै विश एष वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा।।
    (यजु. 10। 18)

    भौम- ॐ अग्निमूर्धा दिव: ककुत्पति: पृथिव्या अयम्। अपां रेतां सि जिन्वति।। (यजु. 3।12) 

    बुध- ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते सं सृजेधामयं च। अस्मिन्त्सधस्‍थे अध्‍युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यशमानश्च सीदत।। (यजु. 15।54) 

     गुरु- ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु। यद्दीदयच्छवस ऋतुप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्।। (यजु. 26।3)

    शुक्र- ॐ अन्नात्परिस्त्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपित्क्षत्रं पय: सोमं प्रजापति:। ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु।। (यजु. 19।75) 

    शनि- ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्त्रवन्तु न:।। (यजु. 36।12) 

    राहु- ॐ कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृध: सखा। कया शचिष्ठया वृता।। (यजु. 36।4)

    केतु- ॐ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे। समुषद्भिरजायथा:।। (यजु. 29।37)

    यजुर्वेद में ग्रहों से सम्बन्धित ऋचाएं - क्रमशः -1 

    सूर्य- ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् (यजु. 33। 43, 34। 31) 

    चन्द्र- ॐ इमं देवा असपत्नं सुवध्यं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठ्याय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय। इमममुष्य पुत्रममुष्ये पुत्रमस्यै विश एष वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा।।
    (यजु. 10। 18)

    भौम- ॐ अग्निमूर्धा दिव: ककुत्पति: पृथिव्या अयम्। अपां रेतां सि जिन्वति।। (यजु. 3।12) 

    बुध- ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते सं सृजेधामयं च। अस्मिन्त्सधस्‍थे अध्‍युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यशमानश्च सीदत।। (यजु. 15।54) 

     गुरु- ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु। यद्दीदयच्छवस ऋतुप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्।। (यजु. 26।3)

    शुक्र- ॐ अन्नात्परिस्त्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपित्क्षत्रं पय: सोमं प्रजापति:। ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु।। (यजु. 19।75) 

    शनि- ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्त्रवन्तु न:।। (यजु. 36।12) 

    राहु- ॐ कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृध: सखा। कया शचिष्ठया वृता।। (यजु. 36।4)

    केतु- ॐ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे। समुषद्भिरजायथा:।। (यजु. 29।37)

उपनिषद् - धारा

    ईशावास्योपनिषद् (मन्त्र-अनुवाद )-----1 (क्रमशः)

    (ईशावास्योपनिषद् शुक्लयजुर्वेदकाण्वसंहिता का ४०वां अध्याय है.  )

    ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते I

    पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते I I 1 I I

    ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

    = सच्चिदानन्दघन, अदः = वह परब्रह्म, पूर्णम् = सब प्रकार से पूर्ण हैं, इदम् = यह जगत् भी, पूर्णम् = पूर्ण (ही) है, (क्योंकि) पूर्णात् = पूर्ण से (परब्रह्म) से ही, पूर्णम् = यह पूर्ण, उदच्यते = उत्पन्न हुआ है, पूर्णस्य = पूर्ण के (से), पूर्णम् = पूर्ण को, आदाय = निकाल लेने पर (भी), पूर्णम् = पूर्ण, एव = ही, अवशिष्यते = बचता है.

    अर्थात् सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमेश्वर पुरुषोत्तम सब प्रकार से सदा-सर्वदा परिपूर्ण है. यह जगत् भी उस परब्रह्म से परिपूर्ण है क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है. इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत् पूर्ण है. इसलिए भी वह परिपूर्ण है. उस पूर्ण ब्रह्म से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही बच रहता है.

    त्रिविध ताप की शान्ति हो. ( ताप या दुःख तीन प्रकार के होते है - आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक )

    साभार - ईशादि नौ उपनिषद - गीता प्रेस            

    ईशावास्योपनिषद् (मन्त्र-अनुवाद )-----1 (क्रमशः)

    (ईशावास्योपनिषद् शुक्लयजुर्वेदकाण्वसंहिता का ४०वां अध्याय है.  )

    ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते I

    पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते I I 1 I I

    ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

    = सच्चिदानन्दघन, अदः = वह परब्रह्म, पूर्णम् = सब प्रकार से पूर्ण हैं, इदम् = यह जगत् भी, पूर्णम् = पूर्ण (ही) है, (क्योंकि) पूर्णात् = पूर्ण से (परब्रह्म) से ही, पूर्णम् = यह पूर्ण, उदच्यते = उत्पन्न हुआ है, पूर्णस्य = पूर्ण के (से), पूर्णम् = पूर्ण को, आदाय = निकाल लेने पर (भी), पूर्णम् = पूर्ण, एव = ही, अवशिष्यते = बचता है.

    अर्थात् सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमेश्वर पुरुषोत्तम सब प्रकार से सदा-सर्वदा परिपूर्ण है. यह जगत् भी उस परब्रह्म से परिपूर्ण है क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है. इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत् पूर्ण है. इसलिए भी वह परिपूर्ण है. उस पूर्ण ब्रह्म से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही बच रहता है.

    त्रिविध ताप की शान्ति हो. ( ताप या दुःख तीन प्रकार के होते है - आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक )

    साभार - ईशादि नौ उपनिषद - गीता प्रेस            

सुभाषितम्

    पुष्पे गन्धं तिले तैलं काष्ठेऽग्निं पयसि घृतम्।
    इक्षौ गुडं तथा देहे पश्याऽत्मानं विवेकत: ॥

     अर्थात् जैसे पुष्प मे गन्ध, तिल मे तैल, काष्ठ मे अग्नि, दूध मे घी और ईख मे गुड होता है वैसे शरीर मे परमात्मा विद्यमान है, विवेक द्वारा आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार करना चाहिये ।

    पात्रे त्यागी गुणे रागी संविभागी च बन्धुषु।
    शास्त्रे बोद्धा रणे योद्धा स वै पुरुष पञ्चलक्षणः उच्चते।।

    अर्थात् जो उचित पात्र के लिए त्याग करता है, दूसरों के गुणों को स्वीकार करता है, अपने सुख-दुःख को बन्धु-बान्धव के साथ बाँटता है, शास्त्रों से ज्ञान ग्रहण करता है, युद्ध में वीरता का प्रदर्शन करता है, उसे ही सच्चे अर्थ में पुरुष कहा जाता है।

    विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
    यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्।।

    अर्थात् विपत्तिकाल में धैर्य धारण करना और समृद्धिकाल में क्षमाशीलता, सभा में वचन नैपुण्य, युद्धभूमि में शौर्य, यश प्राप्ति में विशेष रूचि और वेदाध्ययन कार्य में विशेष आसक्ति निश्चयपूर्वक ये उपर्युक्त सभी बातें महापुरुषों में स्वभाव से ही सिद्ध होती हैं।

    सौजन्य से - श्री कुलदीप पुरोहित (गुजरात)

    नैवाकृतिः फलति नैव कुलं न शीलं,

    विद्यापि नैव न च यत्नकृतापि सेवा।

    भाग्यानि पूर्वतपसा किल सञ्चितानि,

    काले फलन्ति पुरुषस्य यथैव वृक्षाः।।

    अन्वयः -

    आकृतिः न फलति एव । कुलं न (फलति) एव । शीलं न (फलति एव) । विद्या अपि न (फलति) एव । यत्नकृता सेवा अपि च न (फलति एव) । यथा वृक्षाः काले फलन्ति (तथा एव) पुरुषस्य पूर्वतपसा सञ्चितानि भाग्यानि (काले फलन्ति)।

     भावानुवादः -

    --आकृतिः,कुलं,शीलं,विद्या वा यत्नकृता सेवा-  सर्वाणि एतानि न फलीभूतानि भवन्ति। किन्तु यथा वृक्षः योग्यकाले  फलानि ददाति तथैव पूर्वतपसा सञ्चितानि  कर्माणि योग्यकाले एव पुरुषाय फलं ददाति।

    हिन्दी अनुवादः -

    --आकृति, कुल, चारित्र, विद्या या यत्नपूर्वक की गई सेवा- इनमें से कुछ भी तत्काल फलीभूत होता नही है ; लेकिन जैसे वृक्ष समय आने पर ही फल देते है, वैसे ही पूर्व में किए गए तप से सञ्चित हुए कर्म समय पर मनुष्य को फल देते है।

    पुष्पे गन्धं तिले तैलं काष्ठेऽग्निं पयसि घृतम्।
    इक्षौ गुडं तथा देहे पश्याऽत्मानं विवेकत: ॥

     अर्थात् जैसे पुष्प मे गन्ध, तिल मे तैल, काष्ठ मे अग्नि, दूध मे घी और ईख मे गुड होता है वैसे शरीर मे परमात्मा विद्यमान है, विवेक द्वारा आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार करना चाहिये ।

    पात्रे त्यागी गुणे रागी संविभागी च बन्धुषु।
    शास्त्रे बोद्धा रणे योद्धा स वै पुरुष पञ्चलक्षणः उच्चते।।

    अर्थात् जो उचित पात्र के लिए त्याग करता है, दूसरों के गुणों को स्वीकार करता है, अपने सुख-दुःख को बन्धु-बान्धव के साथ बाँटता है, शास्त्रों से ज्ञान ग्रहण करता है, युद्ध में वीरता का प्रदर्शन करता है, उसे ही सच्चे अर्थ में पुरुष कहा जाता है।

    विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
    यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्।।

    अर्थात् विपत्तिकाल में धैर्य धारण करना और समृद्धिकाल में क्षमाशीलता, सभा में वचन नैपुण्य, युद्धभूमि में शौर्य, यश प्राप्ति में विशेष रूचि और वेदाध्ययन कार्य में विशेष आसक्ति निश्चयपूर्वक ये उपर्युक्त सभी बातें महापुरुषों में स्वभाव से ही सिद्ध होती हैं।

    सौजन्य से - श्री कुलदीप पुरोहित (गुजरात)

    नैवाकृतिः फलति नैव कुलं न शीलं,

    विद्यापि नैव न च यत्नकृतापि सेवा।

    भाग्यानि पूर्वतपसा किल सञ्चितानि,

    काले फलन्ति पुरुषस्य यथैव वृक्षाः।।

    अन्वयः -

    आकृतिः न फलति एव । कुलं न (फलति) एव । शीलं न (फलति एव) । विद्या अपि न (फलति) एव । यत्नकृता सेवा अपि च न (फलति एव) । यथा वृक्षाः काले फलन्ति (तथा एव) पुरुषस्य पूर्वतपसा सञ्चितानि भाग्यानि (काले फलन्ति)।

     भावानुवादः -

    --आकृतिः,कुलं,शीलं,विद्या वा यत्नकृता सेवा-  सर्वाणि एतानि न फलीभूतानि भवन्ति। किन्तु यथा वृक्षः योग्यकाले  फलानि ददाति तथैव पूर्वतपसा सञ्चितानि  कर्माणि योग्यकाले एव पुरुषाय फलं ददाति।

    हिन्दी अनुवादः -

    --आकृति, कुल, चारित्र, विद्या या यत्नपूर्वक की गई सेवा- इनमें से कुछ भी तत्काल फलीभूत होता नही है ; लेकिन जैसे वृक्ष समय आने पर ही फल देते है, वैसे ही पूर्व में किए गए तप से सञ्चित हुए कर्म समय पर मनुष्य को फल देते है।

कारक और उपपद विभक्ति का प्रयोग - 1

  • सुनीत कुमार सिंह

कारकविभक्ति और उपपदविभक्ति में अन्तर :---!!!

सामान्य रूप से दो प्रकार की विभक्तियाँ होती है --- (1.) कारक विभक्ति, (2.) उपपद विभक्ति,

(1.) कारक विभक्तिः---कारकों के लक्षण के आधार पर अर्थात् कारक की परिभाषा के आधार पर जहाँ पर विभक्तियाँ आती है, उसे कारक विभक्ति कहते हैं । जैसेः----कर्म कारक की परिभाषा है---कर्त्ता कर्म के द्वारा जिसे सबसे अधिक चाहता है, उसे कर्म कारक कहते हैं। इस परिभाषा के आधार पर जब कर्म कारक में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग होता है, तब वह विभक्ति कारक विभक्ति कहलाती है, क्योंकि यहाँ जो विभक्ति आ रही है, वह कारक के कारण से आ रही है , जैसेः---यज्ञदत्तः वेदं पठति ।यहाँ इस वाक्य में यज्ञदत्तः में कर्त्ता कारक के कारण से प्रथमा विभक्ति और "वेदम्" में कर्म कारक के कारण से द्वितीया विभक्ति हुई है ।अब ये दोनों विभक्ति कारक विभक्ति कहलाएगी ।

(2.) उपपद विभक्तिः----जिन वाक्यों में किसी विशेष पद के कारण से जो विभक्ति आती है, वह उपपद विभक्ति होती है। उसमें कारक की परिभाषा नहीं घटती या उपलक्षित होती है। वहाँ पर कारक की अवहेलना की जाती है। वहाँ कारक से कोई अभिप्राय नहीं होता । कहना चाहिए कि यह कारक का अपवाद होता है । जैसेः---नगरम् उभयतः वनमस्ति । इस वाक्य में "नगरम्" में जो द्वितीया हुई है, वह कारक के कारण से नहीं है अर्थात् यहाँ पर"कर्म कारक" की परिभाषा लागू नहीं होती और ना ही "कर्मणि द्वितीया" से यहाँ द्वितीया हुई है, अपितु "उभयतः" इस विशेष पद के कारण से "नगरम्" में द्वितीया हुई है । अतः इसे उपपद विभक्ति कहते हैं ।
"उपपद" शब्द का अर्थ हैः---जो पद के समीप हो । उभयतः पद के समीप नगर शब्द है, अतः उसमें द्वितीया हो गई है ।इस प्रकार के अन्य शब्द हैंः---
(1.) अभितः, उभयतः (दोनों ओर), परितः, सर्वतः (चारों ओर), प्रति (ओर), हा (दुःख), समया, निकषा (पास), धिक् (धिक्कार), अनु (अनुसरण करना) आदि इन शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति ही होगी । उदाः---(क) अभितः, उभयतः---यज्ञशालाम् अभितः (उभयतः) वृक्षाः सन्ति ।(ख) परितः, सर्वतः-----विद्यालयं परितः (सर्वतः) वनमस्ति ।(ग) प्रति----बालकः गुरुकुलं प्रति गच्छति ।(घ) समया, निकषा----ग्रामंनिकषा (समया) नदी वहति ।(ङ) धिक्---रावणं धिक् ।(च) हा---हा दुर्जनम् ।(छ) अनु---विद्वान् धर्मम् अनुगच्छति ।

(2.) सह, साकम्, साधर्म्, समम् (साथ), अलम् (निषेध), प्रयोजनम् , किम् (क्या), कार्यम् , अर्थः, आदि शब्दों के योग में तृतीया विभक्ति होती है । जैसेः---(क) सह---पुत्रः जनकेन (पित्रा) सह (साकम्, साधर्म्, समम्) तीर्थं (मन्दिरम्) गच्छति ।(ख) अलम्---अलम् विवादेन ।(ग) प्रयोजनम्--- मूर्खेण पुत्रेण किं प्रयोजनम् , किं कार्यम्, कोSर्थः ?

(3.) नमः , स्वस्ति (कल्याण), स्वाहा, स्वधा (कल्याण), अलम् (समर्थ) , वषट् (स्वाहा) , रुच्(अच्छा लगना) , क्रुध्, द्रुह्, , ईर्ष्या, असूया (निन्दा) आदि के योग में चतुर्थी होती हैः---(क) नमः---नमः गुरवे ।नमः शिवाय ।(ख) स्वस्ति---शिष्याय स्वस्ति ।(ग) स्वाहा---अग्नयेस्वाहा ।(घ) स्वधा---पितृभ्यः स्वधा ।(ङ) अलम्---रामः रावणाय अलम् ।(च) वषट्---सूर्याय वषट् ।(छ) रुच्---बालकाय (गणेशाय) मोदकं रोचते ।(ज) क्रुध्---सज्जनःदुर्जनाय क्रुध्यति, द्रुह्यति, कुप्यति ।(झ) ईर्ष्य्, असूय्---मूर्खः सज्जनाय ईर्ष्यति, असूयति ।

(4.) ऋते (विना), पूर्व आदि दिशा वाची, प्रभृति (से लेकर), बहिः (बाहर), अन्य, इतर (दूसरा), आरात् (पास), भी-धातु, रक्षा, जिससे विद्या पढी जाए, जुगुप्सा--(घृणा), विरम (रुकना), प्रमाद--(पृथक् होना या आलस्य), उत्पन्न होना, निलीयते (छिपना), प्रति यच्छति (बदले में देना), पृथक् (अलग), विना, दूर और निकट वाची शब्दों के योग में पञ्चमी होती है। जैसेः---(क) ऋते---ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः ।(ख) पूर्व----ग्रामात् पूर्वः पर्वतः अस्ति ।(ग) प्रभृति----रामःशैशवाद् प्रभृति मृत्यु-पर्यन्तं धर्मस्य सेवाम् अकरोत् ।(घ) बहिः---यज्ञशालायाः बहिः प्रवचनं भवति। (ङ) इतर, अन्य---सत्यहरिश्चन्द्रात् अन्यः कोSस्ति, यः सर्वथा सत्यं वदति। (च) आरात्---ग्रामात् आरात् गोशाला वर्तते। (छ) भय---सर्वदमनः सिंहात् न बिभेति ।(ज) रक्ष्----कृष्णः पापात् पाण्डवान् रक्षति। (झ) आख्यात---देवदत्तः गुरोः वेदम् अधीते ।(ञ) जुगुप्सा---सज्जनः पापात् जुगुप्सते , विरमति, प्रमाद्यति। (ट) प्रभवति---गङ्गा हिमालयात् प्रभवति, उद्भवति। (ठ) निलीयते---सैनिकात् (आरक्षकात्) चौरः निलीयते । (ड) प्रति यच्छति---जनः तिलेभ्यः माषान् प्रति यच्छति । (ढ) पृथक्---सीता रामात् (रामम्, रामेण) पृथक् न उपवसति । (ञ) विना---सीता रामात् (रामम्, रामेण) विना वनं न गच्छति । (त) दूर---ग्रामस्य दूरात् (दूरेण, दूरम्) चिकित्सालयः वर्तते । (थ) पटुः ---सैनिकात् पटुतरः चौरः अस्ति ।

कारकविभक्ति और उपपदविभक्ति में अन्तर :---!!!

सामान्य रूप से दो प्रकार की विभक्तियाँ होती है --- (1.) कारक विभक्ति, (2.) उपपद विभक्ति,

(1.) कारक विभक्तिः---कारकों के लक्षण के आधार पर अर्थात् कारक की परिभाषा के आधार पर जहाँ पर विभक्तियाँ आती है, उसे कारक विभक्ति कहते हैं । जैसेः----कर्म कारक की परिभाषा है---कर्त्ता कर्म के द्वारा जिसे सबसे अधिक चाहता है, उसे कर्म कारक कहते हैं। इस परिभाषा के आधार पर जब कर्म कारक में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग होता है, तब वह विभक्ति कारक विभक्ति कहलाती है, क्योंकि यहाँ जो विभक्ति आ रही है, वह कारक के कारण से आ रही है , जैसेः---यज्ञदत्तः वेदं पठति ।यहाँ इस वाक्य में यज्ञदत्तः में कर्त्ता कारक के कारण से प्रथमा विभक्ति और "वेदम्" में कर्म कारक के कारण से द्वितीया विभक्ति हुई है ।अब ये दोनों विभक्ति कारक विभक्ति कहलाएगी ।

(2.) उपपद विभक्तिः----जिन वाक्यों में किसी विशेष पद के कारण से जो विभक्ति आती है, वह उपपद विभक्ति होती है। उसमें कारक की परिभाषा नहीं घटती या उपलक्षित होती है। वहाँ पर कारक की अवहेलना की जाती है। वहाँ कारक से कोई अभिप्राय नहीं होता । कहना चाहिए कि यह कारक का अपवाद होता है । जैसेः---नगरम् उभयतः वनमस्ति । इस वाक्य में "नगरम्" में जो द्वितीया हुई है, वह कारक के कारण से नहीं है अर्थात् यहाँ पर"कर्म कारक" की परिभाषा लागू नहीं होती और ना ही "कर्मणि द्वितीया" से यहाँ द्वितीया हुई है, अपितु "उभयतः" इस विशेष पद के कारण से "नगरम्" में द्वितीया हुई है । अतः इसे उपपद विभक्ति कहते हैं ।
"उपपद" शब्द का अर्थ हैः---जो पद के समीप हो । उभयतः पद के समीप नगर शब्द है, अतः उसमें द्वितीया हो गई है ।इस प्रकार के अन्य शब्द हैंः---
(1.) अभितः, उभयतः (दोनों ओर), परितः, सर्वतः (चारों ओर), प्रति (ओर), हा (दुःख), समया, निकषा (पास), धिक् (धिक्कार), अनु (अनुसरण करना) आदि इन शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति ही होगी । उदाः---(क) अभितः, उभयतः---यज्ञशालाम् अभितः (उभयतः) वृक्षाः सन्ति ।(ख) परितः, सर्वतः-----विद्यालयं परितः (सर्वतः) वनमस्ति ।(ग) प्रति----बालकः गुरुकुलं प्रति गच्छति ।(घ) समया, निकषा----ग्रामंनिकषा (समया) नदी वहति ।(ङ) धिक्---रावणं धिक् ।(च) हा---हा दुर्जनम् ।(छ) अनु---विद्वान् धर्मम् अनुगच्छति ।

(2.) सह, साकम्, साधर्म्, समम् (साथ), अलम् (निषेध), प्रयोजनम् , किम् (क्या), कार्यम् , अर्थः, आदि शब्दों के योग में तृतीया विभक्ति होती है । जैसेः---(क) सह---पुत्रः जनकेन (पित्रा) सह (साकम्, साधर्म्, समम्) तीर्थं (मन्दिरम्) गच्छति ।(ख) अलम्---अलम् विवादेन ।(ग) प्रयोजनम्--- मूर्खेण पुत्रेण किं प्रयोजनम् , किं कार्यम्, कोSर्थः ?

(3.) नमः , स्वस्ति (कल्याण), स्वाहा, स्वधा (कल्याण), अलम् (समर्थ) , वषट् (स्वाहा) , रुच्(अच्छा लगना) , क्रुध्, द्रुह्, , ईर्ष्या, असूया (निन्दा) आदि के योग में चतुर्थी होती हैः---(क) नमः---नमः गुरवे ।नमः शिवाय ।(ख) स्वस्ति---शिष्याय स्वस्ति ।(ग) स्वाहा---अग्नयेस्वाहा ।(घ) स्वधा---पितृभ्यः स्वधा ।(ङ) अलम्---रामः रावणाय अलम् ।(च) वषट्---सूर्याय वषट् ।(छ) रुच्---बालकाय (गणेशाय) मोदकं रोचते ।(ज) क्रुध्---सज्जनःदुर्जनाय क्रुध्यति, द्रुह्यति, कुप्यति ।(झ) ईर्ष्य्, असूय्---मूर्खः सज्जनाय ईर्ष्यति, असूयति ।

(4.) ऋते (विना), पूर्व आदि दिशा वाची, प्रभृति (से लेकर), बहिः (बाहर), अन्य, इतर (दूसरा), आरात् (पास), भी-धातु, रक्षा, जिससे विद्या पढी जाए, जुगुप्सा--(घृणा), विरम (रुकना), प्रमाद--(पृथक् होना या आलस्य), उत्पन्न होना, निलीयते (छिपना), प्रति यच्छति (बदले में देना), पृथक् (अलग), विना, दूर और निकट वाची शब्दों के योग में पञ्चमी होती है। जैसेः---(क) ऋते---ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः ।(ख) पूर्व----ग्रामात् पूर्वः पर्वतः अस्ति ।(ग) प्रभृति----रामःशैशवाद् प्रभृति मृत्यु-पर्यन्तं धर्मस्य सेवाम् अकरोत् ।(घ) बहिः---यज्ञशालायाः बहिः प्रवचनं भवति। (ङ) इतर, अन्य---सत्यहरिश्चन्द्रात् अन्यः कोSस्ति, यः सर्वथा सत्यं वदति। (च) आरात्---ग्रामात् आरात् गोशाला वर्तते। (छ) भय---सर्वदमनः सिंहात् न बिभेति ।(ज) रक्ष्----कृष्णः पापात् पाण्डवान् रक्षति। (झ) आख्यात---देवदत्तः गुरोः वेदम् अधीते ।(ञ) जुगुप्सा---सज्जनः पापात् जुगुप्सते , विरमति, प्रमाद्यति। (ट) प्रभवति---गङ्गा हिमालयात् प्रभवति, उद्भवति। (ठ) निलीयते---सैनिकात् (आरक्षकात्) चौरः निलीयते । (ड) प्रति यच्छति---जनः तिलेभ्यः माषान् प्रति यच्छति । (ढ) पृथक्---सीता रामात् (रामम्, रामेण) पृथक् न उपवसति । (ञ) विना---सीता रामात् (रामम्, रामेण) विना वनं न गच्छति । (त) दूर---ग्रामस्य दूरात् (दूरेण, दूरम्) चिकित्सालयः वर्तते । (थ) पटुः ---सैनिकात् पटुतरः चौरः अस्ति ।

 

कारक और उपपद विभक्ति का प्रयोग - 1

  • सुनीत कुमार सिंह

कारकविभक्ति और उपपदविभक्ति में अन्तर :---!!!

सामान्य रूप से दो प्रकार की विभक्तियाँ होती है --- (1.) कारक विभक्ति, (2.) उपपद विभक्ति,

(1.) कारक विभक्तिः---कारकों के लक्षण के आधार पर अर्थात् कारक की परिभाषा के आधार पर जहाँ पर विभक्तियाँ आती है, उसे कारक विभक्ति कहते हैं । जैसेः----कर्म कारक की परिभाषा है---कर्त्ता कर्म के द्वारा जिसे सबसे अधिक चाहता है, उसे कर्म कारक कहते हैं। इस परिभाषा के आधार पर जब कर्म कारक में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग होता है, तब वह विभक्ति कारक विभक्ति कहलाती है, क्योंकि यहाँ जो विभक्ति आ रही है, वह कारक के कारण से आ रही है , जैसेः---यज्ञदत्तः वेदं पठति ।यहाँ इस वाक्य में यज्ञदत्तः में कर्त्ता कारक के कारण से प्रथमा विभक्ति और "वेदम्" में कर्म कारक के कारण से द्वितीया विभक्ति हुई है ।अब ये दोनों विभक्ति कारक विभक्ति कहलाएगी ।

(2.) उपपद विभक्तिः----जिन वाक्यों में किसी विशेष पद के कारण से जो विभक्ति आती है, वह उपपद विभक्ति होती है। उसमें कारक की परिभाषा नहीं घटती या उपलक्षित होती है। वहाँ पर कारक की अवहेलना की जाती है। वहाँ कारक से कोई अभिप्राय नहीं होता । कहना चाहिए कि यह कारक का अपवाद होता है । जैसेः---नगरम् उभयतः वनमस्ति । इस वाक्य में "नगरम्" में जो द्वितीया हुई है, वह कारक के कारण से नहीं है अर्थात् यहाँ पर"कर्म कारक" की परिभाषा लागू नहीं होती और ना ही "कर्मणि द्वितीया" से यहाँ द्वितीया हुई है, अपितु "उभयतः" इस विशेष पद के कारण से "नगरम्" में द्वितीया हुई है । अतः इसे उपपद विभक्ति कहते हैं ।
"उपपद" शब्द का अर्थ हैः---जो पद के समीप हो । उभयतः पद के समीप नगर शब्द है, अतः उसमें द्वितीया हो गई है ।इस प्रकार के अन्य शब्द हैंः---
(1.) अभितः, उभयतः (दोनों ओर), परितः, सर्वतः (चारों ओर), प्रति (ओर), हा (दुःख), समया, निकषा (पास), धिक् (धिक्कार), अनु (अनुसरण करना) आदि इन शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति ही होगी । उदाः---(क) अभितः, उभयतः---यज्ञशालाम् अभितः (उभयतः) वृक्षाः सन्ति ।(ख) परितः, सर्वतः-----विद्यालयं परितः (सर्वतः) वनमस्ति ।(ग) प्रति----बालकः गुरुकुलं प्रति गच्छति ।(घ) समया, निकषा----ग्रामंनिकषा (समया) नदी वहति ।(ङ) धिक्---रावणं धिक् ।(च) हा---हा दुर्जनम् ।(छ) अनु---विद्वान् धर्मम् अनुगच्छति ।

(2.) सह, साकम्, साधर्म्, समम् (साथ), अलम् (निषेध), प्रयोजनम् , किम् (क्या), कार्यम् , अर्थः, आदि शब्दों के योग में तृतीया विभक्ति होती है । जैसेः---(क) सह---पुत्रः जनकेन (पित्रा) सह (साकम्, साधर्म्, समम्) तीर्थं (मन्दिरम्) गच्छति ।(ख) अलम्---अलम् विवादेन ।(ग) प्रयोजनम्--- मूर्खेण पुत्रेण किं प्रयोजनम् , किं कार्यम्, कोSर्थः ?

(3.) नमः , स्वस्ति (कल्याण), स्वाहा, स्वधा (कल्याण), अलम् (समर्थ) , वषट् (स्वाहा) , रुच्(अच्छा लगना) , क्रुध्, द्रुह्, , ईर्ष्या, असूया (निन्दा) आदि के योग में चतुर्थी होती हैः---(क) नमः---नमः गुरवे ।नमः शिवाय ।(ख) स्वस्ति---शिष्याय स्वस्ति ।(ग) स्वाहा---अग्नयेस्वाहा ।(घ) स्वधा---पितृभ्यः स्वधा ।(ङ) अलम्---रामः रावणाय अलम् ।(च) वषट्---सूर्याय वषट् ।(छ) रुच्---बालकाय (गणेशाय) मोदकं रोचते ।(ज) क्रुध्---सज्जनःदुर्जनाय क्रुध्यति, द्रुह्यति, कुप्यति ।(झ) ईर्ष्य्, असूय्---मूर्खः सज्जनाय ईर्ष्यति, असूयति ।

(4.) ऋते (विना), पूर्व आदि दिशा वाची, प्रभृति (से लेकर), बहिः (बाहर), अन्य, इतर (दूसरा), आरात् (पास), भी-धातु, रक्षा, जिससे विद्या पढी जाए, जुगुप्सा--(घृणा), विरम (रुकना), प्रमाद--(पृथक् होना या आलस्य), उत्पन्न होना, निलीयते (छिपना), प्रति यच्छति (बदले में देना), पृथक् (अलग), विना, दूर और निकट वाची शब्दों के योग में पञ्चमी होती है। जैसेः---(क) ऋते---ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः ।(ख) पूर्व----ग्रामात् पूर्वः पर्वतः अस्ति ।(ग) प्रभृति----रामःशैशवाद् प्रभृति मृत्यु-पर्यन्तं धर्मस्य सेवाम् अकरोत् ।(घ) बहिः---यज्ञशालायाः बहिः प्रवचनं भवति। (ङ) इतर, अन्य---सत्यहरिश्चन्द्रात् अन्यः कोSस्ति, यः सर्वथा सत्यं वदति। (च) आरात्---ग्रामात् आरात् गोशाला वर्तते। (छ) भय---सर्वदमनः सिंहात् न बिभेति ।(ज) रक्ष्----कृष्णः पापात् पाण्डवान् रक्षति। (झ) आख्यात---देवदत्तः गुरोः वेदम् अधीते ।(ञ) जुगुप्सा---सज्जनः पापात् जुगुप्सते , विरमति, प्रमाद्यति। (ट) प्रभवति---गङ्गा हिमालयात् प्रभवति, उद्भवति। (ठ) निलीयते---सैनिकात् (आरक्षकात्) चौरः निलीयते । (ड) प्रति यच्छति---जनः तिलेभ्यः माषान् प्रति यच्छति । (ढ) पृथक्---सीता रामात् (रामम्, रामेण) पृथक् न उपवसति । (ञ) विना---सीता रामात् (रामम्, रामेण) विना वनं न गच्छति । (त) दूर---ग्रामस्य दूरात् (दूरेण, दूरम्) चिकित्सालयः वर्तते । (थ) पटुः ---सैनिकात् पटुतरः चौरः अस्ति ।

कारकविभक्ति और उपपदविभक्ति में अन्तर :---!!!

सामान्य रूप से दो प्रकार की विभक्तियाँ होती है --- (1.) कारक विभक्ति, (2.) उपपद विभक्ति,

(1.) कारक विभक्तिः---कारकों के लक्षण के आधार पर अर्थात् कारक की परिभाषा के आधार पर जहाँ पर विभक्तियाँ आती है, उसे कारक विभक्ति कहते हैं । जैसेः----कर्म कारक की परिभाषा है---कर्त्ता कर्म के द्वारा जिसे सबसे अधिक चाहता है, उसे कर्म कारक कहते हैं। इस परिभाषा के आधार पर जब कर्म कारक में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग होता है, तब वह विभक्ति कारक विभक्ति कहलाती है, क्योंकि यहाँ जो विभक्ति आ रही है, वह कारक के कारण से आ रही है , जैसेः---यज्ञदत्तः वेदं पठति ।यहाँ इस वाक्य में यज्ञदत्तः में कर्त्ता कारक के कारण से प्रथमा विभक्ति और "वेदम्" में कर्म कारक के कारण से द्वितीया विभक्ति हुई है ।अब ये दोनों विभक्ति कारक विभक्ति कहलाएगी ।

(2.) उपपद विभक्तिः----जिन वाक्यों में किसी विशेष पद के कारण से जो विभक्ति आती है, वह उपपद विभक्ति होती है। उसमें कारक की परिभाषा नहीं घटती या उपलक्षित होती है। वहाँ पर कारक की अवहेलना की जाती है। वहाँ कारक से कोई अभिप्राय नहीं होता । कहना चाहिए कि यह कारक का अपवाद होता है । जैसेः---नगरम् उभयतः वनमस्ति । इस वाक्य में "नगरम्" में जो द्वितीया हुई है, वह कारक के कारण से नहीं है अर्थात् यहाँ पर"कर्म कारक" की परिभाषा लागू नहीं होती और ना ही "कर्मणि द्वितीया" से यहाँ द्वितीया हुई है, अपितु "उभयतः" इस विशेष पद के कारण से "नगरम्" में द्वितीया हुई है । अतः इसे उपपद विभक्ति कहते हैं ।
"उपपद" शब्द का अर्थ हैः---जो पद के समीप हो । उभयतः पद के समीप नगर शब्द है, अतः उसमें द्वितीया हो गई है ।इस प्रकार के अन्य शब्द हैंः---
(1.) अभितः, उभयतः (दोनों ओर), परितः, सर्वतः (चारों ओर), प्रति (ओर), हा (दुःख), समया, निकषा (पास), धिक् (धिक्कार), अनु (अनुसरण करना) आदि इन शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति ही होगी । उदाः---(क) अभितः, उभयतः---यज्ञशालाम् अभितः (उभयतः) वृक्षाः सन्ति ।(ख) परितः, सर्वतः-----विद्यालयं परितः (सर्वतः) वनमस्ति ।(ग) प्रति----बालकः गुरुकुलं प्रति गच्छति ।(घ) समया, निकषा----ग्रामंनिकषा (समया) नदी वहति ।(ङ) धिक्---रावणं धिक् ।(च) हा---हा दुर्जनम् ।(छ) अनु---विद्वान् धर्मम् अनुगच्छति ।

(2.) सह, साकम्, साधर्म्, समम् (साथ), अलम् (निषेध), प्रयोजनम् , किम् (क्या), कार्यम् , अर्थः, आदि शब्दों के योग में तृतीया विभक्ति होती है । जैसेः---(क) सह---पुत्रः जनकेन (पित्रा) सह (साकम्, साधर्म्, समम्) तीर्थं (मन्दिरम्) गच्छति ।(ख) अलम्---अलम् विवादेन ।(ग) प्रयोजनम्--- मूर्खेण पुत्रेण किं प्रयोजनम् , किं कार्यम्, कोSर्थः ?

(3.) नमः , स्वस्ति (कल्याण), स्वाहा, स्वधा (कल्याण), अलम् (समर्थ) , वषट् (स्वाहा) , रुच्(अच्छा लगना) , क्रुध्, द्रुह्, , ईर्ष्या, असूया (निन्दा) आदि के योग में चतुर्थी होती हैः---(क) नमः---नमः गुरवे ।नमः शिवाय ।(ख) स्वस्ति---शिष्याय स्वस्ति ।(ग) स्वाहा---अग्नयेस्वाहा ।(घ) स्वधा---पितृभ्यः स्वधा ।(ङ) अलम्---रामः रावणाय अलम् ।(च) वषट्---सूर्याय वषट् ।(छ) रुच्---बालकाय (गणेशाय) मोदकं रोचते ।(ज) क्रुध्---सज्जनःदुर्जनाय क्रुध्यति, द्रुह्यति, कुप्यति ।(झ) ईर्ष्य्, असूय्---मूर्खः सज्जनाय ईर्ष्यति, असूयति ।

(4.) ऋते (विना), पूर्व आदि दिशा वाची, प्रभृति (से लेकर), बहिः (बाहर), अन्य, इतर (दूसरा), आरात् (पास), भी-धातु, रक्षा, जिससे विद्या पढी जाए, जुगुप्सा--(घृणा), विरम (रुकना), प्रमाद--(पृथक् होना या आलस्य), उत्पन्न होना, निलीयते (छिपना), प्रति यच्छति (बदले में देना), पृथक् (अलग), विना, दूर और निकट वाची शब्दों के योग में पञ्चमी होती है। जैसेः---(क) ऋते---ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः ।(ख) पूर्व----ग्रामात् पूर्वः पर्वतः अस्ति ।(ग) प्रभृति----रामःशैशवाद् प्रभृति मृत्यु-पर्यन्तं धर्मस्य सेवाम् अकरोत् ।(घ) बहिः---यज्ञशालायाः बहिः प्रवचनं भवति। (ङ) इतर, अन्य---सत्यहरिश्चन्द्रात् अन्यः कोSस्ति, यः सर्वथा सत्यं वदति। (च) आरात्---ग्रामात् आरात् गोशाला वर्तते। (छ) भय---सर्वदमनः सिंहात् न बिभेति ।(ज) रक्ष्----कृष्णः पापात् पाण्डवान् रक्षति। (झ) आख्यात---देवदत्तः गुरोः वेदम् अधीते ।(ञ) जुगुप्सा---सज्जनः पापात् जुगुप्सते , विरमति, प्रमाद्यति। (ट) प्रभवति---गङ्गा हिमालयात् प्रभवति, उद्भवति। (ठ) निलीयते---सैनिकात् (आरक्षकात्) चौरः निलीयते । (ड) प्रति यच्छति---जनः तिलेभ्यः माषान् प्रति यच्छति । (ढ) पृथक्---सीता रामात् (रामम्, रामेण) पृथक् न उपवसति । (ञ) विना---सीता रामात् (रामम्, रामेण) विना वनं न गच्छति । (त) दूर---ग्रामस्य दूरात् (दूरेण, दूरम्) चिकित्सालयः वर्तते । (थ) पटुः ---सैनिकात् पटुतरः चौरः अस्ति ।

 

कारक और उपपद विभक्ति का प्रयोग - 1

  • सुनीत कुमार सिंह

कारकविभक्ति और उपपदविभक्ति में अन्तर :---!!!

सामान्य रूप से दो प्रकार की विभक्तियाँ होती है --- (1.) कारक विभक्ति, (2.) उपपद विभक्ति,

(1.) कारक विभक्तिः---कारकों के लक्षण के आधार पर अर्थात् कारक की परिभाषा के आधार पर जहाँ पर विभक्तियाँ आती है, उसे कारक विभक्ति कहते हैं । जैसेः----कर्म कारक की परिभाषा है---कर्त्ता कर्म के द्वारा जिसे सबसे अधिक चाहता है, उसे कर्म कारक कहते हैं। इस परिभाषा के आधार पर जब कर्म कारक में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग होता है, तब वह विभक्ति कारक विभक्ति कहलाती है, क्योंकि यहाँ जो विभक्ति आ रही है, वह कारक के कारण से आ रही है , जैसेः---यज्ञदत्तः वेदं पठति ।यहाँ इस वाक्य में यज्ञदत्तः में कर्त्ता कारक के कारण से प्रथमा विभक्ति और "वेदम्" में कर्म कारक के कारण से द्वितीया विभक्ति हुई है ।अब ये दोनों विभक्ति कारक विभक्ति कहलाएगी ।

(2.) उपपद विभक्तिः----जिन वाक्यों में किसी विशेष पद के कारण से जो विभक्ति आती है, वह उपपद विभक्ति होती है। उसमें कारक की परिभाषा नहीं घटती या उपलक्षित होती है। वहाँ पर कारक की अवहेलना की जाती है। वहाँ कारक से कोई अभिप्राय नहीं होता । कहना चाहिए कि यह कारक का अपवाद होता है । जैसेः---नगरम् उभयतः वनमस्ति । इस वाक्य में "नगरम्" में जो द्वितीया हुई है, वह कारक के कारण से नहीं है अर्थात् यहाँ पर"कर्म कारक" की परिभाषा लागू नहीं होती और ना ही "कर्मणि द्वितीया" से यहाँ द्वितीया हुई है, अपितु "उभयतः" इस विशेष पद के कारण से "नगरम्" में द्वितीया हुई है । अतः इसे उपपद विभक्ति कहते हैं ।
"उपपद" शब्द का अर्थ हैः---जो पद के समीप हो । उभयतः पद के समीप नगर शब्द है, अतः उसमें द्वितीया हो गई है ।इस प्रकार के अन्य शब्द हैंः---
(1.) अभितः, उभयतः (दोनों ओर), परितः, सर्वतः (चारों ओर), प्रति (ओर), हा (दुःख), समया, निकषा (पास), धिक् (धिक्कार), अनु (अनुसरण करना) आदि इन शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति ही होगी । उदाः---(क) अभितः, उभयतः---यज्ञशालाम् अभितः (उभयतः) वृक्षाः सन्ति ।(ख) परितः, सर्वतः-----विद्यालयं परितः (सर्वतः) वनमस्ति ।(ग) प्रति----बालकः गुरुकुलं प्रति गच्छति ।(घ) समया, निकषा----ग्रामंनिकषा (समया) नदी वहति ।(ङ) धिक्---रावणं धिक् ।(च) हा---हा दुर्जनम् ।(छ) अनु---विद्वान् धर्मम् अनुगच्छति ।

(2.) सह, साकम्, साधर्म्, समम् (साथ), अलम् (निषेध), प्रयोजनम् , किम् (क्या), कार्यम् , अर्थः, आदि शब्दों के योग में तृतीया विभक्ति होती है । जैसेः---(क) सह---पुत्रः जनकेन (पित्रा) सह (साकम्, साधर्म्, समम्) तीर्थं (मन्दिरम्) गच्छति ।(ख) अलम्---अलम् विवादेन ।(ग) प्रयोजनम्--- मूर्खेण पुत्रेण किं प्रयोजनम् , किं कार्यम्, कोSर्थः ?

(3.) नमः , स्वस्ति (कल्याण), स्वाहा, स्वधा (कल्याण), अलम् (समर्थ) , वषट् (स्वाहा) , रुच्(अच्छा लगना) , क्रुध्, द्रुह्, , ईर्ष्या, असूया (निन्दा) आदि के योग में चतुर्थी होती हैः---(क) नमः---नमः गुरवे ।नमः शिवाय ।(ख) स्वस्ति---शिष्याय स्वस्ति ।(ग) स्वाहा---अग्नयेस्वाहा ।(घ) स्वधा---पितृभ्यः स्वधा ।(ङ) अलम्---रामः रावणाय अलम् ।(च) वषट्---सूर्याय वषट् ।(छ) रुच्---बालकाय (गणेशाय) मोदकं रोचते ।(ज) क्रुध्---सज्जनःदुर्जनाय क्रुध्यति, द्रुह्यति, कुप्यति ।(झ) ईर्ष्य्, असूय्---मूर्खः सज्जनाय ईर्ष्यति, असूयति ।

(4.) ऋते (विना), पूर्व आदि दिशा वाची, प्रभृति (से लेकर), बहिः (बाहर), अन्य, इतर (दूसरा), आरात् (पास), भी-धातु, रक्षा, जिससे विद्या पढी जाए, जुगुप्सा--(घृणा), विरम (रुकना), प्रमाद--(पृथक् होना या आलस्य), उत्पन्न होना, निलीयते (छिपना), प्रति यच्छति (बदले में देना), पृथक् (अलग), विना, दूर और निकट वाची शब्दों के योग में पञ्चमी होती है। जैसेः---(क) ऋते---ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः ।(ख) पूर्व----ग्रामात् पूर्वः पर्वतः अस्ति ।(ग) प्रभृति----रामःशैशवाद् प्रभृति मृत्यु-पर्यन्तं धर्मस्य सेवाम् अकरोत् ।(घ) बहिः---यज्ञशालायाः बहिः प्रवचनं भवति। (ङ) इतर, अन्य---सत्यहरिश्चन्द्रात् अन्यः कोSस्ति, यः सर्वथा सत्यं वदति। (च) आरात्---ग्रामात् आरात् गोशाला वर्तते। (छ) भय---सर्वदमनः सिंहात् न बिभेति ।(ज) रक्ष्----कृष्णः पापात् पाण्डवान् रक्षति। (झ) आख्यात---देवदत्तः गुरोः वेदम् अधीते ।(ञ) जुगुप्सा---सज्जनः पापात् जुगुप्सते , विरमति, प्रमाद्यति। (ट) प्रभवति---गङ्गा हिमालयात् प्रभवति, उद्भवति। (ठ) निलीयते---सैनिकात् (आरक्षकात्) चौरः निलीयते । (ड) प्रति यच्छति---जनः तिलेभ्यः माषान् प्रति यच्छति । (ढ) पृथक्---सीता रामात् (रामम्, रामेण) पृथक् न उपवसति । (ञ) विना---सीता रामात् (रामम्, रामेण) विना वनं न गच्छति । (त) दूर---ग्रामस्य दूरात् (दूरेण, दूरम्) चिकित्सालयः वर्तते । (थ) पटुः ---सैनिकात् पटुतरः चौरः अस्ति ।

कारकविभक्ति और उपपदविभक्ति में अन्तर :---!!!

सामान्य रूप से दो प्रकार की विभक्तियाँ होती है --- (1.) कारक विभक्ति, (2.) उपपद विभक्ति,

(1.) कारक विभक्तिः---कारकों के लक्षण के आधार पर अर्थात् कारक की परिभाषा के आधार पर जहाँ पर विभक्तियाँ आती है, उसे कारक विभक्ति कहते हैं । जैसेः----कर्म कारक की परिभाषा है---कर्त्ता कर्म के द्वारा जिसे सबसे अधिक चाहता है, उसे कर्म कारक कहते हैं। इस परिभाषा के आधार पर जब कर्म कारक में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग होता है, तब वह विभक्ति कारक विभक्ति कहलाती है, क्योंकि यहाँ जो विभक्ति आ रही है, वह कारक के कारण से आ रही है , जैसेः---यज्ञदत्तः वेदं पठति ।यहाँ इस वाक्य में यज्ञदत्तः में कर्त्ता कारक के कारण से प्रथमा विभक्ति और "वेदम्" में कर्म कारक के कारण से द्वितीया विभक्ति हुई है ।अब ये दोनों विभक्ति कारक विभक्ति कहलाएगी ।

(2.) उपपद विभक्तिः----जिन वाक्यों में किसी विशेष पद के कारण से जो विभक्ति आती है, वह उपपद विभक्ति होती है। उसमें कारक की परिभाषा नहीं घटती या उपलक्षित होती है। वहाँ पर कारक की अवहेलना की जाती है। वहाँ कारक से कोई अभिप्राय नहीं होता । कहना चाहिए कि यह कारक का अपवाद होता है । जैसेः---नगरम् उभयतः वनमस्ति । इस वाक्य में "नगरम्" में जो द्वितीया हुई है, वह कारक के कारण से नहीं है अर्थात् यहाँ पर"कर्म कारक" की परिभाषा लागू नहीं होती और ना ही "कर्मणि द्वितीया" से यहाँ द्वितीया हुई है, अपितु "उभयतः" इस विशेष पद के कारण से "नगरम्" में द्वितीया हुई है । अतः इसे उपपद विभक्ति कहते हैं ।
"उपपद" शब्द का अर्थ हैः---जो पद के समीप हो । उभयतः पद के समीप नगर शब्द है, अतः उसमें द्वितीया हो गई है ।इस प्रकार के अन्य शब्द हैंः---
(1.) अभितः, उभयतः (दोनों ओर), परितः, सर्वतः (चारों ओर), प्रति (ओर), हा (दुःख), समया, निकषा (पास), धिक् (धिक्कार), अनु (अनुसरण करना) आदि इन शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति ही होगी । उदाः---(क) अभितः, उभयतः---यज्ञशालाम् अभितः (उभयतः) वृक्षाः सन्ति ।(ख) परितः, सर्वतः-----विद्यालयं परितः (सर्वतः) वनमस्ति ।(ग) प्रति----बालकः गुरुकुलं प्रति गच्छति ।(घ) समया, निकषा----ग्रामंनिकषा (समया) नदी वहति ।(ङ) धिक्---रावणं धिक् ।(च) हा---हा दुर्जनम् ।(छ) अनु---विद्वान् धर्मम् अनुगच्छति ।

(2.) सह, साकम्, साधर्म्, समम् (साथ), अलम् (निषेध), प्रयोजनम् , किम् (क्या), कार्यम् , अर्थः, आदि शब्दों के योग में तृतीया विभक्ति होती है । जैसेः---(क) सह---पुत्रः जनकेन (पित्रा) सह (साकम्, साधर्म्, समम्) तीर्थं (मन्दिरम्) गच्छति ।(ख) अलम्---अलम् विवादेन ।(ग) प्रयोजनम्--- मूर्खेण पुत्रेण किं प्रयोजनम् , किं कार्यम्, कोSर्थः ?

(3.) नमः , स्वस्ति (कल्याण), स्वाहा, स्वधा (कल्याण), अलम् (समर्थ) , वषट् (स्वाहा) , रुच्(अच्छा लगना) , क्रुध्, द्रुह्, , ईर्ष्या, असूया (निन्दा) आदि के योग में चतुर्थी होती हैः---(क) नमः---नमः गुरवे ।नमः शिवाय ।(ख) स्वस्ति---शिष्याय स्वस्ति ।(ग) स्वाहा---अग्नयेस्वाहा ।(घ) स्वधा---पितृभ्यः स्वधा ।(ङ) अलम्---रामः रावणाय अलम् ।(च) वषट्---सूर्याय वषट् ।(छ) रुच्---बालकाय (गणेशाय) मोदकं रोचते ।(ज) क्रुध्---सज्जनःदुर्जनाय क्रुध्यति, द्रुह्यति, कुप्यति ।(झ) ईर्ष्य्, असूय्---मूर्खः सज्जनाय ईर्ष्यति, असूयति ।

(4.) ऋते (विना), पूर्व आदि दिशा वाची, प्रभृति (से लेकर), बहिः (बाहर), अन्य, इतर (दूसरा), आरात् (पास), भी-धातु, रक्षा, जिससे विद्या पढी जाए, जुगुप्सा--(घृणा), विरम (रुकना), प्रमाद--(पृथक् होना या आलस्य), उत्पन्न होना, निलीयते (छिपना), प्रति यच्छति (बदले में देना), पृथक् (अलग), विना, दूर और निकट वाची शब्दों के योग में पञ्चमी होती है। जैसेः---(क) ऋते---ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः ।(ख) पूर्व----ग्रामात् पूर्वः पर्वतः अस्ति ।(ग) प्रभृति----रामःशैशवाद् प्रभृति मृत्यु-पर्यन्तं धर्मस्य सेवाम् अकरोत् ।(घ) बहिः---यज्ञशालायाः बहिः प्रवचनं भवति। (ङ) इतर, अन्य---सत्यहरिश्चन्द्रात् अन्यः कोSस्ति, यः सर्वथा सत्यं वदति। (च) आरात्---ग्रामात् आरात् गोशाला वर्तते। (छ) भय---सर्वदमनः सिंहात् न बिभेति ।(ज) रक्ष्----कृष्णः पापात् पाण्डवान् रक्षति। (झ) आख्यात---देवदत्तः गुरोः वेदम् अधीते ।(ञ) जुगुप्सा---सज्जनः पापात् जुगुप्सते , विरमति, प्रमाद्यति। (ट) प्रभवति---गङ्गा हिमालयात् प्रभवति, उद्भवति। (ठ) निलीयते---सैनिकात् (आरक्षकात्) चौरः निलीयते । (ड) प्रति यच्छति---जनः तिलेभ्यः माषान् प्रति यच्छति । (ढ) पृथक्---सीता रामात् (रामम्, रामेण) पृथक् न उपवसति । (ञ) विना---सीता रामात् (रामम्, रामेण) विना वनं न गच्छति । (त) दूर---ग्रामस्य दूरात् (दूरेण, दूरम्) चिकित्सालयः वर्तते । (थ) पटुः ---सैनिकात् पटुतरः चौरः अस्ति ।

 

कारक और उपपद विभक्ति का प्रयोग - 1

  • सुनीत कुमार सिंह

कारकविभक्ति और उपपदविभक्ति में अन्तर :---!!!

सामान्य रूप से दो प्रकार की विभक्तियाँ होती है --- (1.) कारक विभक्ति, (2.) उपपद विभक्ति,

(1.) कारक विभक्तिः---कारकों के लक्षण के आधार पर अर्थात् कारक की परिभाषा के आधार पर जहाँ पर विभक्तियाँ आती है, उसे कारक विभक्ति कहते हैं । जैसेः----कर्म कारक की परिभाषा है---कर्त्ता कर्म के द्वारा जिसे सबसे अधिक चाहता है, उसे कर्म कारक कहते हैं। इस परिभाषा के आधार पर जब कर्म कारक में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग होता है, तब वह विभक्ति कारक विभक्ति कहलाती है, क्योंकि यहाँ जो विभक्ति आ रही है, वह कारक के कारण से आ रही है , जैसेः---यज्ञदत्तः वेदं पठति ।यहाँ इस वाक्य में यज्ञदत्तः में कर्त्ता कारक के कारण से प्रथमा विभक्ति और "वेदम्" में कर्म कारक के कारण से द्वितीया विभक्ति हुई है ।अब ये दोनों विभक्ति कारक विभक्ति कहलाएगी ।

(2.) उपपद विभक्तिः----जिन वाक्यों में किसी विशेष पद के कारण से जो विभक्ति आती है, वह उपपद विभक्ति होती है। उसमें कारक की परिभाषा नहीं घटती या उपलक्षित होती है। वहाँ पर कारक की अवहेलना की जाती है। वहाँ कारक से कोई अभिप्राय नहीं होता । कहना चाहिए कि यह कारक का अपवाद होता है । जैसेः---नगरम् उभयतः वनमस्ति । इस वाक्य में "नगरम्" में जो द्वितीया हुई है, वह कारक के कारण से नहीं है अर्थात् यहाँ पर"कर्म कारक" की परिभाषा लागू नहीं होती और ना ही "कर्मणि द्वितीया" से यहाँ द्वितीया हुई है, अपितु "उभयतः" इस विशेष पद के कारण से "नगरम्" में द्वितीया हुई है । अतः इसे उपपद विभक्ति कहते हैं ।
"उपपद" शब्द का अर्थ हैः---जो पद के समीप हो । उभयतः पद के समीप नगर शब्द है, अतः उसमें द्वितीया हो गई है ।इस प्रकार के अन्य शब्द हैंः---
(1.) अभितः, उभयतः (दोनों ओर), परितः, सर्वतः (चारों ओर), प्रति (ओर), हा (दुःख), समया, निकषा (पास), धिक् (धिक्कार), अनु (अनुसरण करना) आदि इन शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति ही होगी । उदाः---(क) अभितः, उभयतः---यज्ञशालाम् अभितः (उभयतः) वृक्षाः सन्ति ।(ख) परितः, सर्वतः-----विद्यालयं परितः (सर्वतः) वनमस्ति ।(ग) प्रति----बालकः गुरुकुलं प्रति गच्छति ।(घ) समया, निकषा----ग्रामंनिकषा (समया) नदी वहति ।(ङ) धिक्---रावणं धिक् ।(च) हा---हा दुर्जनम् ।(छ) अनु---विद्वान् धर्मम् अनुगच्छति ।

(2.) सह, साकम्, साधर्म्, समम् (साथ), अलम् (निषेध), प्रयोजनम् , किम् (क्या), कार्यम् , अर्थः, आदि शब्दों के योग में तृतीया विभक्ति होती है । जैसेः---(क) सह---पुत्रः जनकेन (पित्रा) सह (साकम्, साधर्म्, समम्) तीर्थं (मन्दिरम्) गच्छति ।(ख) अलम्---अलम् विवादेन ।(ग) प्रयोजनम्--- मूर्खेण पुत्रेण किं प्रयोजनम् , किं कार्यम्, कोSर्थः ?

(3.) नमः , स्वस्ति (कल्याण), स्वाहा, स्वधा (कल्याण), अलम् (समर्थ) , वषट् (स्वाहा) , रुच्(अच्छा लगना) , क्रुध्, द्रुह्, , ईर्ष्या, असूया (निन्दा) आदि के योग में चतुर्थी होती हैः---(क) नमः---नमः गुरवे ।नमः शिवाय ।(ख) स्वस्ति---शिष्याय स्वस्ति ।(ग) स्वाहा---अग्नयेस्वाहा ।(घ) स्वधा---पितृभ्यः स्वधा ।(ङ) अलम्---रामः रावणाय अलम् ।(च) वषट्---सूर्याय वषट् ।(छ) रुच्---बालकाय (गणेशाय) मोदकं रोचते ।(ज) क्रुध्---सज्जनःदुर्जनाय क्रुध्यति, द्रुह्यति, कुप्यति ।(झ) ईर्ष्य्, असूय्---मूर्खः सज्जनाय ईर्ष्यति, असूयति ।

(4.) ऋते (विना), पूर्व आदि दिशा वाची, प्रभृति (से लेकर), बहिः (बाहर), अन्य, इतर (दूसरा), आरात् (पास), भी-धातु, रक्षा, जिससे विद्या पढी जाए, जुगुप्सा--(घृणा), विरम (रुकना), प्रमाद--(पृथक् होना या आलस्य), उत्पन्न होना, निलीयते (छिपना), प्रति यच्छति (बदले में देना), पृथक् (अलग), विना, दूर और निकट वाची शब्दों के योग में पञ्चमी होती है। जैसेः---(क) ऋते---ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः ।(ख) पूर्व----ग्रामात् पूर्वः पर्वतः अस्ति ।(ग) प्रभृति----रामःशैशवाद् प्रभृति मृत्यु-पर्यन्तं धर्मस्य सेवाम् अकरोत् ।(घ) बहिः---यज्ञशालायाः बहिः प्रवचनं भवति। (ङ) इतर, अन्य---सत्यहरिश्चन्द्रात् अन्यः कोSस्ति, यः सर्वथा सत्यं वदति। (च) आरात्---ग्रामात् आरात् गोशाला वर्तते। (छ) भय---सर्वदमनः सिंहात् न बिभेति ।(ज) रक्ष्----कृष्णः पापात् पाण्डवान् रक्षति। (झ) आख्यात---देवदत्तः गुरोः वेदम् अधीते ।(ञ) जुगुप्सा---सज्जनः पापात् जुगुप्सते , विरमति, प्रमाद्यति। (ट) प्रभवति---गङ्गा हिमालयात् प्रभवति, उद्भवति। (ठ) निलीयते---सैनिकात् (आरक्षकात्) चौरः निलीयते । (ड) प्रति यच्छति---जनः तिलेभ्यः माषान् प्रति यच्छति । (ढ) पृथक्---सीता रामात् (रामम्, रामेण) पृथक् न उपवसति । (ञ) विना---सीता रामात् (रामम्, रामेण) विना वनं न गच्छति । (त) दूर---ग्रामस्य दूरात् (दूरेण, दूरम्) चिकित्सालयः वर्तते । (थ) पटुः ---सैनिकात् पटुतरः चौरः अस्ति ।

कारकविभक्ति और उपपदविभक्ति में अन्तर :---!!!

सामान्य रूप से दो प्रकार की विभक्तियाँ होती है --- (1.) कारक विभक्ति, (2.) उपपद विभक्ति,

(1.) कारक विभक्तिः---कारकों के लक्षण के आधार पर अर्थात् कारक की परिभाषा के आधार पर जहाँ पर विभक्तियाँ आती है, उसे कारक विभक्ति कहते हैं । जैसेः----कर्म कारक की परिभाषा है---कर्त्ता कर्म के द्वारा जिसे सबसे अधिक चाहता है, उसे कर्म कारक कहते हैं। इस परिभाषा के आधार पर जब कर्म कारक में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग होता है, तब वह विभक्ति कारक विभक्ति कहलाती है, क्योंकि यहाँ जो विभक्ति आ रही है, वह कारक के कारण से आ रही है , जैसेः---यज्ञदत्तः वेदं पठति ।यहाँ इस वाक्य में यज्ञदत्तः में कर्त्ता कारक के कारण से प्रथमा विभक्ति और "वेदम्" में कर्म कारक के कारण से द्वितीया विभक्ति हुई है ।अब ये दोनों विभक्ति कारक विभक्ति कहलाएगी ।

(2.) उपपद विभक्तिः----जिन वाक्यों में किसी विशेष पद के कारण से जो विभक्ति आती है, वह उपपद विभक्ति होती है। उसमें कारक की परिभाषा नहीं घटती या उपलक्षित होती है। वहाँ पर कारक की अवहेलना की जाती है। वहाँ कारक से कोई अभिप्राय नहीं होता । कहना चाहिए कि यह कारक का अपवाद होता है । जैसेः---नगरम् उभयतः वनमस्ति । इस वाक्य में "नगरम्" में जो द्वितीया हुई है, वह कारक के कारण से नहीं है अर्थात् यहाँ पर"कर्म कारक" की परिभाषा लागू नहीं होती और ना ही "कर्मणि द्वितीया" से यहाँ द्वितीया हुई है, अपितु "उभयतः" इस विशेष पद के कारण से "नगरम्" में द्वितीया हुई है । अतः इसे उपपद विभक्ति कहते हैं ।
"उपपद" शब्द का अर्थ हैः---जो पद के समीप हो । उभयतः पद के समीप नगर शब्द है, अतः उसमें द्वितीया हो गई है ।इस प्रकार के अन्य शब्द हैंः---
(1.) अभितः, उभयतः (दोनों ओर), परितः, सर्वतः (चारों ओर), प्रति (ओर), हा (दुःख), समया, निकषा (पास), धिक् (धिक्कार), अनु (अनुसरण करना) आदि इन शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति ही होगी । उदाः---(क) अभितः, उभयतः---यज्ञशालाम् अभितः (उभयतः) वृक्षाः सन्ति ।(ख) परितः, सर्वतः-----विद्यालयं परितः (सर्वतः) वनमस्ति ।(ग) प्रति----बालकः गुरुकुलं प्रति गच्छति ।(घ) समया, निकषा----ग्रामंनिकषा (समया) नदी वहति ।(ङ) धिक्---रावणं धिक् ।(च) हा---हा दुर्जनम् ।(छ) अनु---विद्वान् धर्मम् अनुगच्छति ।

(2.) सह, साकम्, साधर्म्, समम् (साथ), अलम् (निषेध), प्रयोजनम् , किम् (क्या), कार्यम् , अर्थः, आदि शब्दों के योग में तृतीया विभक्ति होती है । जैसेः---(क) सह---पुत्रः जनकेन (पित्रा) सह (साकम्, साधर्म्, समम्) तीर्थं (मन्दिरम्) गच्छति ।(ख) अलम्---अलम् विवादेन ।(ग) प्रयोजनम्--- मूर्खेण पुत्रेण किं प्रयोजनम् , किं कार्यम्, कोSर्थः ?

(3.) नमः , स्वस्ति (कल्याण), स्वाहा, स्वधा (कल्याण), अलम् (समर्थ) , वषट् (स्वाहा) , रुच्(अच्छा लगना) , क्रुध्, द्रुह्, , ईर्ष्या, असूया (निन्दा) आदि के योग में चतुर्थी होती हैः---(क) नमः---नमः गुरवे ।नमः शिवाय ।(ख) स्वस्ति---शिष्याय स्वस्ति ।(ग) स्वाहा---अग्नयेस्वाहा ।(घ) स्वधा---पितृभ्यः स्वधा ।(ङ) अलम्---रामः रावणाय अलम् ।(च) वषट्---सूर्याय वषट् ।(छ) रुच्---बालकाय (गणेशाय) मोदकं रोचते ।(ज) क्रुध्---सज्जनःदुर्जनाय क्रुध्यति, द्रुह्यति, कुप्यति ।(झ) ईर्ष्य्, असूय्---मूर्खः सज्जनाय ईर्ष्यति, असूयति ।

(4.) ऋते (विना), पूर्व आदि दिशा वाची, प्रभृति (से लेकर), बहिः (बाहर), अन्य, इतर (दूसरा), आरात् (पास), भी-धातु, रक्षा, जिससे विद्या पढी जाए, जुगुप्सा--(घृणा), विरम (रुकना), प्रमाद--(पृथक् होना या आलस्य), उत्पन्न होना, निलीयते (छिपना), प्रति यच्छति (बदले में देना), पृथक् (अलग), विना, दूर और निकट वाची शब्दों के योग में पञ्चमी होती है। जैसेः---(क) ऋते---ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः ।(ख) पूर्व----ग्रामात् पूर्वः पर्वतः अस्ति ।(ग) प्रभृति----रामःशैशवाद् प्रभृति मृत्यु-पर्यन्तं धर्मस्य सेवाम् अकरोत् ।(घ) बहिः---यज्ञशालायाः बहिः प्रवचनं भवति। (ङ) इतर, अन्य---सत्यहरिश्चन्द्रात् अन्यः कोSस्ति, यः सर्वथा सत्यं वदति। (च) आरात्---ग्रामात् आरात् गोशाला वर्तते। (छ) भय---सर्वदमनः सिंहात् न बिभेति ।(ज) रक्ष्----कृष्णः पापात् पाण्डवान् रक्षति। (झ) आख्यात---देवदत्तः गुरोः वेदम् अधीते ।(ञ) जुगुप्सा---सज्जनः पापात् जुगुप्सते , विरमति, प्रमाद्यति। (ट) प्रभवति---गङ्गा हिमालयात् प्रभवति, उद्भवति। (ठ) निलीयते---सैनिकात् (आरक्षकात्) चौरः निलीयते । (ड) प्रति यच्छति---जनः तिलेभ्यः माषान् प्रति यच्छति । (ढ) पृथक्---सीता रामात् (रामम्, रामेण) पृथक् न उपवसति । (ञ) विना---सीता रामात् (रामम्, रामेण) विना वनं न गच्छति । (त) दूर---ग्रामस्य दूरात् (दूरेण, दूरम्) चिकित्सालयः वर्तते । (थ) पटुः ---सैनिकात् पटुतरः चौरः अस्ति ।

 

टिप्पणियाँ :
  • डॉ० अनुराग मिश्र

    कारकविभक्ति के बारे में भी क्रमशः लिखें

  • डॉ० अनुराग मिश्र

    कारकविभक्ति के बारे में भी क्रमशः लिखें

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