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वेदवाणी

    यजुर्वेद में ग्रहों से सम्बन्धित ऋचाएं - क्रमशः -1 

    सूर्य- ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् (यजु. 33। 43, 34। 31) 

    चन्द्र- ॐ इमं देवा असपत्नं सुवध्यं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठ्याय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय। इमममुष्य पुत्रममुष्ये पुत्रमस्यै विश एष वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा।।
    (यजु. 10। 18)

    भौम- ॐ अग्निमूर्धा दिव: ककुत्पति: पृथिव्या अयम्। अपां रेतां सि जिन्वति।। (यजु. 3।12) 

    बुध- ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते सं सृजेधामयं च। अस्मिन्त्सधस्‍थे अध्‍युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यशमानश्च सीदत।। (यजु. 15।54) 

     गुरु- ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु। यद्दीदयच्छवस ऋतुप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्।। (यजु. 26।3)

    शुक्र- ॐ अन्नात्परिस्त्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपित्क्षत्रं पय: सोमं प्रजापति:। ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु।। (यजु. 19।75) 

    शनि- ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्त्रवन्तु न:।। (यजु. 36।12) 

    राहु- ॐ कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृध: सखा। कया शचिष्ठया वृता।। (यजु. 36।4)

    केतु- ॐ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे। समुषद्भिरजायथा:।। (यजु. 29।37)

    यजुर्वेद में ग्रहों से सम्बन्धित ऋचाएं - क्रमशः -1 

    सूर्य- ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् (यजु. 33। 43, 34। 31) 

    चन्द्र- ॐ इमं देवा असपत्नं सुवध्यं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठ्याय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय। इमममुष्य पुत्रममुष्ये पुत्रमस्यै विश एष वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा।।
    (यजु. 10। 18)

    भौम- ॐ अग्निमूर्धा दिव: ककुत्पति: पृथिव्या अयम्। अपां रेतां सि जिन्वति।। (यजु. 3।12) 

    बुध- ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते सं सृजेधामयं च। अस्मिन्त्सधस्‍थे अध्‍युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यशमानश्च सीदत।। (यजु. 15।54) 

     गुरु- ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु। यद्दीदयच्छवस ऋतुप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्।। (यजु. 26।3)

    शुक्र- ॐ अन्नात्परिस्त्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपित्क्षत्रं पय: सोमं प्रजापति:। ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु।। (यजु. 19।75) 

    शनि- ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्त्रवन्तु न:।। (यजु. 36।12) 

    राहु- ॐ कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृध: सखा। कया शचिष्ठया वृता।। (यजु. 36।4)

    केतु- ॐ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे। समुषद्भिरजायथा:।। (यजु. 29।37)

उपनिषद् - धारा

    ईशावास्योपनिषद् (मन्त्र-अनुवाद )-----1 (क्रमशः)

    (ईशावास्योपनिषद् शुक्लयजुर्वेदकाण्वसंहिता का ४०वां अध्याय है.  )

    ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते I

    पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते I I 1 I I

    ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

    = सच्चिदानन्दघन, अदः = वह परब्रह्म, पूर्णम् = सब प्रकार से पूर्ण हैं, इदम् = यह जगत् भी, पूर्णम् = पूर्ण (ही) है, (क्योंकि) पूर्णात् = पूर्ण से (परब्रह्म) से ही, पूर्णम् = यह पूर्ण, उदच्यते = उत्पन्न हुआ है, पूर्णस्य = पूर्ण के (से), पूर्णम् = पूर्ण को, आदाय = निकाल लेने पर (भी), पूर्णम् = पूर्ण, एव = ही, अवशिष्यते = बचता है.

    अर्थात् सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमेश्वर पुरुषोत्तम सब प्रकार से सदा-सर्वदा परिपूर्ण है. यह जगत् भी उस परब्रह्म से परिपूर्ण है क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है. इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत् पूर्ण है. इसलिए भी वह परिपूर्ण है. उस पूर्ण ब्रह्म से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही बच रहता है.

    त्रिविध ताप की शान्ति हो. ( ताप या दुःख तीन प्रकार के होते है - आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक )

    साभार - ईशादि नौ उपनिषद - गीता प्रेस            

    ईशावास्योपनिषद् (मन्त्र-अनुवाद )-----1 (क्रमशः)

    (ईशावास्योपनिषद् शुक्लयजुर्वेदकाण्वसंहिता का ४०वां अध्याय है.  )

    ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते I

    पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते I I 1 I I

    ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

    = सच्चिदानन्दघन, अदः = वह परब्रह्म, पूर्णम् = सब प्रकार से पूर्ण हैं, इदम् = यह जगत् भी, पूर्णम् = पूर्ण (ही) है, (क्योंकि) पूर्णात् = पूर्ण से (परब्रह्म) से ही, पूर्णम् = यह पूर्ण, उदच्यते = उत्पन्न हुआ है, पूर्णस्य = पूर्ण के (से), पूर्णम् = पूर्ण को, आदाय = निकाल लेने पर (भी), पूर्णम् = पूर्ण, एव = ही, अवशिष्यते = बचता है.

    अर्थात् सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमेश्वर पुरुषोत्तम सब प्रकार से सदा-सर्वदा परिपूर्ण है. यह जगत् भी उस परब्रह्म से परिपूर्ण है क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है. इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत् पूर्ण है. इसलिए भी वह परिपूर्ण है. उस पूर्ण ब्रह्म से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही बच रहता है.

    त्रिविध ताप की शान्ति हो. ( ताप या दुःख तीन प्रकार के होते है - आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक )

    साभार - ईशादि नौ उपनिषद - गीता प्रेस            

सुभाषितम्

    पुष्पे गन्धं तिले तैलं काष्ठेऽग्निं पयसि घृतम्।
    इक्षौ गुडं तथा देहे पश्याऽत्मानं विवेकत: ॥

     अर्थात् जैसे पुष्प मे गन्ध, तिल मे तैल, काष्ठ मे अग्नि, दूध मे घी और ईख मे गुड होता है वैसे शरीर मे परमात्मा विद्यमान है, विवेक द्वारा आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार करना चाहिये ।

    पात्रे त्यागी गुणे रागी संविभागी च बन्धुषु।
    शास्त्रे बोद्धा रणे योद्धा स वै पुरुष पञ्चलक्षणः उच्चते।।

    अर्थात् जो उचित पात्र के लिए त्याग करता है, दूसरों के गुणों को स्वीकार करता है, अपने सुख-दुःख को बन्धु-बान्धव के साथ बाँटता है, शास्त्रों से ज्ञान ग्रहण करता है, युद्ध में वीरता का प्रदर्शन करता है, उसे ही सच्चे अर्थ में पुरुष कहा जाता है।

    विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
    यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्।।

    अर्थात् विपत्तिकाल में धैर्य धारण करना और समृद्धिकाल में क्षमाशीलता, सभा में वचन नैपुण्य, युद्धभूमि में शौर्य, यश प्राप्ति में विशेष रूचि और वेदाध्ययन कार्य में विशेष आसक्ति निश्चयपूर्वक ये उपर्युक्त सभी बातें महापुरुषों में स्वभाव से ही सिद्ध होती हैं।

    सौजन्य से - श्री कुलदीप पुरोहित (गुजरात)

    नैवाकृतिः फलति नैव कुलं न शीलं,

    विद्यापि नैव न च यत्नकृतापि सेवा।

    भाग्यानि पूर्वतपसा किल सञ्चितानि,

    काले फलन्ति पुरुषस्य यथैव वृक्षाः।।

    अन्वयः -

    आकृतिः न फलति एव । कुलं न (फलति) एव । शीलं न (फलति एव) । विद्या अपि न (फलति) एव । यत्नकृता सेवा अपि च न (फलति एव) । यथा वृक्षाः काले फलन्ति (तथा एव) पुरुषस्य पूर्वतपसा सञ्चितानि भाग्यानि (काले फलन्ति)।

     भावानुवादः -

    --आकृतिः,कुलं,शीलं,विद्या वा यत्नकृता सेवा-  सर्वाणि एतानि न फलीभूतानि भवन्ति। किन्तु यथा वृक्षः योग्यकाले  फलानि ददाति तथैव पूर्वतपसा सञ्चितानि  कर्माणि योग्यकाले एव पुरुषाय फलं ददाति।

    हिन्दी अनुवादः -

    --आकृति, कुल, चारित्र, विद्या या यत्नपूर्वक की गई सेवा- इनमें से कुछ भी तत्काल फलीभूत होता नही है ; लेकिन जैसे वृक्ष समय आने पर ही फल देते है, वैसे ही पूर्व में किए गए तप से सञ्चित हुए कर्म समय पर मनुष्य को फल देते है।

    पुष्पे गन्धं तिले तैलं काष्ठेऽग्निं पयसि घृतम्।
    इक्षौ गुडं तथा देहे पश्याऽत्मानं विवेकत: ॥

     अर्थात् जैसे पुष्प मे गन्ध, तिल मे तैल, काष्ठ मे अग्नि, दूध मे घी और ईख मे गुड होता है वैसे शरीर मे परमात्मा विद्यमान है, विवेक द्वारा आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार करना चाहिये ।

    पात्रे त्यागी गुणे रागी संविभागी च बन्धुषु।
    शास्त्रे बोद्धा रणे योद्धा स वै पुरुष पञ्चलक्षणः उच्चते।।

    अर्थात् जो उचित पात्र के लिए त्याग करता है, दूसरों के गुणों को स्वीकार करता है, अपने सुख-दुःख को बन्धु-बान्धव के साथ बाँटता है, शास्त्रों से ज्ञान ग्रहण करता है, युद्ध में वीरता का प्रदर्शन करता है, उसे ही सच्चे अर्थ में पुरुष कहा जाता है।

    विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
    यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्।।

    अर्थात् विपत्तिकाल में धैर्य धारण करना और समृद्धिकाल में क्षमाशीलता, सभा में वचन नैपुण्य, युद्धभूमि में शौर्य, यश प्राप्ति में विशेष रूचि और वेदाध्ययन कार्य में विशेष आसक्ति निश्चयपूर्वक ये उपर्युक्त सभी बातें महापुरुषों में स्वभाव से ही सिद्ध होती हैं।

    सौजन्य से - श्री कुलदीप पुरोहित (गुजरात)

    नैवाकृतिः फलति नैव कुलं न शीलं,

    विद्यापि नैव न च यत्नकृतापि सेवा।

    भाग्यानि पूर्वतपसा किल सञ्चितानि,

    काले फलन्ति पुरुषस्य यथैव वृक्षाः।।

    अन्वयः -

    आकृतिः न फलति एव । कुलं न (फलति) एव । शीलं न (फलति एव) । विद्या अपि न (फलति) एव । यत्नकृता सेवा अपि च न (फलति एव) । यथा वृक्षाः काले फलन्ति (तथा एव) पुरुषस्य पूर्वतपसा सञ्चितानि भाग्यानि (काले फलन्ति)।

     भावानुवादः -

    --आकृतिः,कुलं,शीलं,विद्या वा यत्नकृता सेवा-  सर्वाणि एतानि न फलीभूतानि भवन्ति। किन्तु यथा वृक्षः योग्यकाले  फलानि ददाति तथैव पूर्वतपसा सञ्चितानि  कर्माणि योग्यकाले एव पुरुषाय फलं ददाति।

    हिन्दी अनुवादः -

    --आकृति, कुल, चारित्र, विद्या या यत्नपूर्वक की गई सेवा- इनमें से कुछ भी तत्काल फलीभूत होता नही है ; लेकिन जैसे वृक्ष समय आने पर ही फल देते है, वैसे ही पूर्व में किए गए तप से सञ्चित हुए कर्म समय पर मनुष्य को फल देते है।

सूर्यनमस्कार : ‘भारतराष्ट्र’ की अमूल्य धरोहर

  • मोहन चन्द तिवारी

सूर्य की ‘भरत’ संज्ञा होने के कारण इस देश के सूर्योपासक लोगों का देश ‘भारतवर्ष’ कहलाया। ‘सूर्यनमस्कार’ के साथ भारतवासियों की राष्ट्रीय अस्मिता का इतिहास भी जुड़ा है। हमारे देश के तत्त्वद्रष्टा ऋषि मुनियों ने सूर्य के साथ सायुज्य रखते हुए सूर्य मंत्रों के विनियोग को भी योग की राष्ट्रवादी परम्पराओं के साथ जोड़ दिया। सूर्य मन्त्रों के उच्चारण से योगार्थी का सूर्य की बारह ऊर्जाओं से सायुज्य प्राप्त होता है। उसका तन मन और बुद्धि निर्मल होती है तथा इन आसनों के अभ्यास से उसे आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक तीनों प्रकार की ऊर्जायें एक साथ प्राप्त होती हैं। इसलिए ‘सूर्यनमस्कार’ का मन्त्रयोग ‘भारतराष्ट्र’ की राष्ट्रीय अमूल्य धरोहर है॥

भारत मूलतः सूर्योपासकों का देश होने के कारण ‘भारतराष्ट्र’ की अवधारणा सूर्य के साथ जुड़ी हुई है। यजुर्वेद में सूर्य को ‘राष्ट्र’ भी कहा गया है तथा ‘राष्ट्रपति’ भी। वैदिक साहित्य में प्रजावर्ग का भरण पोषण करने के कारण सूर्य को ‘भरत’ कहा गया है। सूर्य की ‘भरत’ संज्ञा होने के कारण इस देश के सूर्योपासक लोगों का देश ‘भारतवर्ष’ कहलाया। इस प्रकार ‘सूर्यनमस्कार’ के साथ भारतवासियों की राष्ट्रीय अस्मिता का इतिहास भी जुड़ा है। यही कारण है कि हमारे देश के तत्त्वद्रष्टा ऋषि मुनियों ने सूर्य के साथ सायुज्य रखते हुए योग की राष्ट्रवादी परम्पराओं को भी जोड़ा। सूर्य हमारा भरण पोषण ही नहीं करता बल्कि वह हमें अन्धकार से प्रकाश की ओर तथा अज्ञान से ज्ञान की ओर भी प्रेरित करता है। इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि जो लोग सूर्यको प्रतिदिन नमस्कार करते हैं, उन्हें सहस्रों जन्म तक दरिद्रता प्राप्त नहीं होती -

“आदित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने।
जन्मान्तरसहस्रेषु दारिद्र्यं नोपजायते ।।”

‘सूर्य नमस्कार’ का इतिहास
जहां तक वर्तमान में प्रचलित ‘सूर्य नमस्कार’ आसन का सम्बन्ध है, पातञ्जल योगसूत्र का यह हिस्सा नहीं है और न ही इस आसन का अभ्यास करते हुए सूर्य सम्बन्धी मन्त्रों का प्रयोग करने का विधान योगशास्त्र के प्राचीन ग्रन्थों में कहीं मिलता है। किन्तु ‘तैत्तरीय आरण्यक’ में सूर्य नमस्कार से सम्बन्धित चौदह मन्त्र मिलते हैं, उन्हीं में पहले बारह मन्त्रों के अन्तिम भाग ‘सूर्य नमस्कार’ के बारह चरणों या आसनों में प्रयुक्त किया जाता है। इससे प्रतीत होता है कि सूर्योपासक योगसाधकों की एक स्वतन्त्र योग परम्परा का वैदिक काल में ही उदय हो चुका था, जिसका परम्परागत अवशेष यह ‘सूर्यनमस्कार’ नाम से प्रसिद्ध योग है।

वर्तमान ‘सूर्यनमस्कार’ के इतिहास के साथ महाराष्ट्र स्थित औंध के राजा भवनराव पन्त प्रतिनिधि का नाम विशेष रूप से जुड़ा है, जिन्होंने इस आसन को सन् 1920 में प्रचारित किया तथा इस पर ‘द टैन प्वाइन्ट वे टू हैल्थ’ शीर्षक से 1938 में अंग्रेजी में एक लघु पुस्तिका भी लिखी। औंध के राजा ने ही अपने राज्य के स्कूली पाठ्यक्रम में योग की शिक्षा को अनिवार्य किया। तभी से अधिकांश हिन्दू संगठन ‘सूर्य नमस्कार’ को योग की शिक्षा का आवश्यक अंग मानने लगे हैं. ‘सूर्य नमस्कार’ की यौगिक प्रक्रिया का शास्त्रीय रूप कैसा हो? इसके सम्बन्ध में भी तरह तरह के मतभेद दिखाई देते हैं। वर्तमान में ‘सूर्य नमस्कार’ की बारह यौगिक क्रियाओं के साथ सूर्यदेव सम्बन्धी संस्कृत के उपर्युक्त ‘तैत्तरीय आरण्यक’ में आये वैदिक मन्त्रों को भी जोड़ दिया गया है. इसलिए अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस पर यदि ‘सूर्य नमस्कार’ का भी प्रशिक्षण दिया जाता है तो वैदिक धर्म की मान्यताओं का भी सम्मान किया जाना चाहिए और इस आसन का अभ्यास केवल उन्हीं योगार्थियों को कराया जाना चाहिए जो संस्कृत भाषा के सही उच्चारण की क्षमता रखते हों और उन वैदिक मन्त्रों का अर्थ भी जानते हों तभी ‘सूर्य नमस्कार’ की यौगिक प्रक्रिया का सम्पूर्ण लाभ योगार्थियों को प्राप्त हो सकेगा। अन्यथा तो मन्त्रों के अशुद्ध उच्चारण से अनर्थ फल भी झेलना पड़ सकता है।

‘सूर्यनमस्कार’ के मन्त्र 
‘तैत्तरीय आरण्यक’ में सूर्यनमस्कार से सम्बन्धित चौदह मन्त्र मिलते हैं, उन्हीं में से पहले बारह मन्त्रों के अन्तिम भाग ‘सूर्यनमस्कार’ के बारह चरणों या आसनों में प्रयुक्त किया जाता है। प्रत्येक बार किए जाने वाले इन सूर्य मन्त्रों के उच्चारण से योगार्थी का सूर्य की बारह ऊर्जाओं से सायुज्य प्राप्त होता है। उसका तन मन और बुद्धि निर्मल होती है तथा इन आसनों के अभ्यास से उसे आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक तीनों प्रकार की ऊर्जायें प्राप्त होती हैं। वे चौदह वैदिक सूर्य मन्त्र निम्न हैं, जिनमें से पहले बारह मन्त्रों का उच्चारण ‘सूर्यनमस्कार’ के बारह चरणों का अभ्यास करते हुए किया जाता है -

ॐ मित्राय नमः, 2. ॐ रवये नमः, 3. ॐ सूर्याय नमः, 4.ॐ भानवे नमः, 5.ॐ खगाय नमः, 6. ॐ पूष्णे नमः,7. ॐ हिरण्यगर्भाय नमः, 8. ॐ मरीचये नमः, 9. ॐ आदित्याय नमः, 10.ॐ सवित्रे नमः, 11. ॐ अर्काय नमः, 12. ॐ भास्कराय नमः, 13. ॐमित्ररवि भ्यां नमः 14. ॐ सूर्यभानुभ्यां नमः

‘सूर्यनमस्कार’ के स्वास्थ्य सम्बन्धी लाभ -
सूर्यनमस्कार सर्वांग शारीरिक व्यायाम की अत्यन्त वैज्ञानिक यौगिक प्रक्रिया है जिसके करने से शरीर के सभी संस्थान, रक्त सञ्चरण, श्वास, पाचन, उत्सर्जन, नाड़ी तथा ग्रन्थों की क्रियाएं सशक्त होती हैं। यह शरीर के सभी अंगों, मांसपेशियों व नसों को क्रियाशील करता है तथा वात, पित्त तथा कफ को सन्तुलित करने में मदद करता है।

इस आसन का नियमित अभ्यास करने से पाचन सम्बन्धी समस्याओं जैसे अपच, कब्ज, बदहजमी, गैस, अफारा तथा भूख न लगना आदि बीमारियों से छुटकारा मिलता है। इससे शरीर की सभी महत्वपूर्ण ग्रन्थियों, जैसे पिट्यूटरी, थायरॉइड, पैराथायरॉइड, एड्रिनल, लीवर, पैंक्रियाज, ओवरी आदि की क्रियाएं सुचालित सन्तुलित रहती हैं। सूर्य नमस्कार से विटामिन-डी मिलता है, जिससे हड्डियां मजबूत होती हैं, आंखों की रोशनी बढती है,शरीर में खून का प्रवाह तेज होता है, जिससे ब्लड प्रेशर की बीमारी में आराम मिलता है। इसके नियमित अभ्यास से मोटापे को दूर किया जा सकता है,बालों को सफेद होने झड़ने व रूसी से बचाया जा सकता है और तनाव, अवसाद, एंग्जायटी, चिड़चिड़ापन आदि मानसिक बीमारियों से भी छुटकारा मिल सकता है।

‘सूर्यनमस्कार’ योग के बारह आसनों का सूर्य के संवत्सर चक्र के बारह महीनों से भी घनिष्ठ सम्बन्ध है। योगाचार्य सद्गुरु ने ‘सूर्यनमस्कार’ योग के द्वादश आसनों के औचित्य को बताते हुए कहा है कि सूर्य के द्वादश चक्रों का जिस तरह चक्रात्मक विकास होता है उसी तरह ‘सूर्यनमस्कार’ के आसनों का अभ्यास करते हुए हम अपने शरीर को इस योग्य बना सकते हैं ताकि सूर्य के द्वादश चक्रों के साथ हमारे शरीर की अनुकूलता बनी रहे-

"Surya Namaskar, which is known as “Sun Salutation” in English, is essentially about building a dimension within you where your physical cycles are in sync with the sun’s cycles, which run about twelve-and-a-quarter years. So it not by accident but by intent that it has been structured with twelve postures or twelve asanas in it. If your system is in a certain level of vibrancy and readiness, and in a good state of receptivity, then naturally your cycle will be in sync with the solar cycle."

सूर्यनमस्कार : ‘भारतराष्ट्र’ की अमूल्य धरोहर

  • मोहन चन्द तिवारी

सूर्य की ‘भरत’ संज्ञा होने के कारण इस देश के सूर्योपासक लोगों का देश ‘भारतवर्ष’ कहलाया। ‘सूर्यनमस्कार’ के साथ भारतवासियों की राष्ट्रीय अस्मिता का इतिहास भी जुड़ा है। हमारे देश के तत्त्वद्रष्टा ऋषि मुनियों ने सूर्य के साथ सायुज्य रखते हुए सूर्य मंत्रों के विनियोग को भी योग की राष्ट्रवादी परम्पराओं के साथ जोड़ दिया। सूर्य मन्त्रों के उच्चारण से योगार्थी का सूर्य की बारह ऊर्जाओं से सायुज्य प्राप्त होता है। उसका तन मन और बुद्धि निर्मल होती है तथा इन आसनों के अभ्यास से उसे आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक तीनों प्रकार की ऊर्जायें एक साथ प्राप्त होती हैं। इसलिए ‘सूर्यनमस्कार’ का मन्त्रयोग ‘भारतराष्ट्र’ की राष्ट्रीय अमूल्य धरोहर है॥

भारत मूलतः सूर्योपासकों का देश होने के कारण ‘भारतराष्ट्र’ की अवधारणा सूर्य के साथ जुड़ी हुई है। यजुर्वेद में सूर्य को ‘राष्ट्र’ भी कहा गया है तथा ‘राष्ट्रपति’ भी। वैदिक साहित्य में प्रजावर्ग का भरण पोषण करने के कारण सूर्य को ‘भरत’ कहा गया है। सूर्य की ‘भरत’ संज्ञा होने के कारण इस देश के सूर्योपासक लोगों का देश ‘भारतवर्ष’ कहलाया। इस प्रकार ‘सूर्यनमस्कार’ के साथ भारतवासियों की राष्ट्रीय अस्मिता का इतिहास भी जुड़ा है। यही कारण है कि हमारे देश के तत्त्वद्रष्टा ऋषि मुनियों ने सूर्य के साथ सायुज्य रखते हुए योग की राष्ट्रवादी परम्पराओं को भी जोड़ा। सूर्य हमारा भरण पोषण ही नहीं करता बल्कि वह हमें अन्धकार से प्रकाश की ओर तथा अज्ञान से ज्ञान की ओर भी प्रेरित करता है। इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि जो लोग सूर्यको प्रतिदिन नमस्कार करते हैं, उन्हें सहस्रों जन्म तक दरिद्रता प्राप्त नहीं होती -

“आदित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने।
जन्मान्तरसहस्रेषु दारिद्र्यं नोपजायते ।।”

‘सूर्य नमस्कार’ का इतिहास
जहां तक वर्तमान में प्रचलित ‘सूर्य नमस्कार’ आसन का सम्बन्ध है, पातञ्जल योगसूत्र का यह हिस्सा नहीं है और न ही इस आसन का अभ्यास करते हुए सूर्य सम्बन्धी मन्त्रों का प्रयोग करने का विधान योगशास्त्र के प्राचीन ग्रन्थों में कहीं मिलता है। किन्तु ‘तैत्तरीय आरण्यक’ में सूर्य नमस्कार से सम्बन्धित चौदह मन्त्र मिलते हैं, उन्हीं में पहले बारह मन्त्रों के अन्तिम भाग ‘सूर्य नमस्कार’ के बारह चरणों या आसनों में प्रयुक्त किया जाता है। इससे प्रतीत होता है कि सूर्योपासक योगसाधकों की एक स्वतन्त्र योग परम्परा का वैदिक काल में ही उदय हो चुका था, जिसका परम्परागत अवशेष यह ‘सूर्यनमस्कार’ नाम से प्रसिद्ध योग है।

वर्तमान ‘सूर्यनमस्कार’ के इतिहास के साथ महाराष्ट्र स्थित औंध के राजा भवनराव पन्त प्रतिनिधि का नाम विशेष रूप से जुड़ा है, जिन्होंने इस आसन को सन् 1920 में प्रचारित किया तथा इस पर ‘द टैन प्वाइन्ट वे टू हैल्थ’ शीर्षक से 1938 में अंग्रेजी में एक लघु पुस्तिका भी लिखी। औंध के राजा ने ही अपने राज्य के स्कूली पाठ्यक्रम में योग की शिक्षा को अनिवार्य किया। तभी से अधिकांश हिन्दू संगठन ‘सूर्य नमस्कार’ को योग की शिक्षा का आवश्यक अंग मानने लगे हैं. ‘सूर्य नमस्कार’ की यौगिक प्रक्रिया का शास्त्रीय रूप कैसा हो? इसके सम्बन्ध में भी तरह तरह के मतभेद दिखाई देते हैं। वर्तमान में ‘सूर्य नमस्कार’ की बारह यौगिक क्रियाओं के साथ सूर्यदेव सम्बन्धी संस्कृत के उपर्युक्त ‘तैत्तरीय आरण्यक’ में आये वैदिक मन्त्रों को भी जोड़ दिया गया है. इसलिए अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस पर यदि ‘सूर्य नमस्कार’ का भी प्रशिक्षण दिया जाता है तो वैदिक धर्म की मान्यताओं का भी सम्मान किया जाना चाहिए और इस आसन का अभ्यास केवल उन्हीं योगार्थियों को कराया जाना चाहिए जो संस्कृत भाषा के सही उच्चारण की क्षमता रखते हों और उन वैदिक मन्त्रों का अर्थ भी जानते हों तभी ‘सूर्य नमस्कार’ की यौगिक प्रक्रिया का सम्पूर्ण लाभ योगार्थियों को प्राप्त हो सकेगा। अन्यथा तो मन्त्रों के अशुद्ध उच्चारण से अनर्थ फल भी झेलना पड़ सकता है।

‘सूर्यनमस्कार’ के मन्त्र 
‘तैत्तरीय आरण्यक’ में सूर्यनमस्कार से सम्बन्धित चौदह मन्त्र मिलते हैं, उन्हीं में से पहले बारह मन्त्रों के अन्तिम भाग ‘सूर्यनमस्कार’ के बारह चरणों या आसनों में प्रयुक्त किया जाता है। प्रत्येक बार किए जाने वाले इन सूर्य मन्त्रों के उच्चारण से योगार्थी का सूर्य की बारह ऊर्जाओं से सायुज्य प्राप्त होता है। उसका तन मन और बुद्धि निर्मल होती है तथा इन आसनों के अभ्यास से उसे आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक तीनों प्रकार की ऊर्जायें प्राप्त होती हैं। वे चौदह वैदिक सूर्य मन्त्र निम्न हैं, जिनमें से पहले बारह मन्त्रों का उच्चारण ‘सूर्यनमस्कार’ के बारह चरणों का अभ्यास करते हुए किया जाता है -

ॐ मित्राय नमः, 2. ॐ रवये नमः, 3. ॐ सूर्याय नमः, 4.ॐ भानवे नमः, 5.ॐ खगाय नमः, 6. ॐ पूष्णे नमः,7. ॐ हिरण्यगर्भाय नमः, 8. ॐ मरीचये नमः, 9. ॐ आदित्याय नमः, 10.ॐ सवित्रे नमः, 11. ॐ अर्काय नमः, 12. ॐ भास्कराय नमः, 13. ॐमित्ररवि भ्यां नमः 14. ॐ सूर्यभानुभ्यां नमः

‘सूर्यनमस्कार’ के स्वास्थ्य सम्बन्धी लाभ -
सूर्यनमस्कार सर्वांग शारीरिक व्यायाम की अत्यन्त वैज्ञानिक यौगिक प्रक्रिया है जिसके करने से शरीर के सभी संस्थान, रक्त सञ्चरण, श्वास, पाचन, उत्सर्जन, नाड़ी तथा ग्रन्थों की क्रियाएं सशक्त होती हैं। यह शरीर के सभी अंगों, मांसपेशियों व नसों को क्रियाशील करता है तथा वात, पित्त तथा कफ को सन्तुलित करने में मदद करता है।

इस आसन का नियमित अभ्यास करने से पाचन सम्बन्धी समस्याओं जैसे अपच, कब्ज, बदहजमी, गैस, अफारा तथा भूख न लगना आदि बीमारियों से छुटकारा मिलता है। इससे शरीर की सभी महत्वपूर्ण ग्रन्थियों, जैसे पिट्यूटरी, थायरॉइड, पैराथायरॉइड, एड्रिनल, लीवर, पैंक्रियाज, ओवरी आदि की क्रियाएं सुचालित सन्तुलित रहती हैं। सूर्य नमस्कार से विटामिन-डी मिलता है, जिससे हड्डियां मजबूत होती हैं, आंखों की रोशनी बढती है,शरीर में खून का प्रवाह तेज होता है, जिससे ब्लड प्रेशर की बीमारी में आराम मिलता है। इसके नियमित अभ्यास से मोटापे को दूर किया जा सकता है,बालों को सफेद होने झड़ने व रूसी से बचाया जा सकता है और तनाव, अवसाद, एंग्जायटी, चिड़चिड़ापन आदि मानसिक बीमारियों से भी छुटकारा मिल सकता है।

‘सूर्यनमस्कार’ योग के बारह आसनों का सूर्य के संवत्सर चक्र के बारह महीनों से भी घनिष्ठ सम्बन्ध है। योगाचार्य सद्गुरु ने ‘सूर्यनमस्कार’ योग के द्वादश आसनों के औचित्य को बताते हुए कहा है कि सूर्य के द्वादश चक्रों का जिस तरह चक्रात्मक विकास होता है उसी तरह ‘सूर्यनमस्कार’ के आसनों का अभ्यास करते हुए हम अपने शरीर को इस योग्य बना सकते हैं ताकि सूर्य के द्वादश चक्रों के साथ हमारे शरीर की अनुकूलता बनी रहे-

"Surya Namaskar, which is known as “Sun Salutation” in English, is essentially about building a dimension within you where your physical cycles are in sync with the sun’s cycles, which run about twelve-and-a-quarter years. So it not by accident but by intent that it has been structured with twelve postures or twelve asanas in it. If your system is in a certain level of vibrancy and readiness, and in a good state of receptivity, then naturally your cycle will be in sync with the solar cycle."

सूर्यनमस्कार : ‘भारतराष्ट्र’ की अमूल्य धरोहर

  • मोहन चन्द तिवारी

सूर्य की ‘भरत’ संज्ञा होने के कारण इस देश के सूर्योपासक लोगों का देश ‘भारतवर्ष’ कहलाया। ‘सूर्यनमस्कार’ के साथ भारतवासियों की राष्ट्रीय अस्मिता का इतिहास भी जुड़ा है। हमारे देश के तत्त्वद्रष्टा ऋषि मुनियों ने सूर्य के साथ सायुज्य रखते हुए सूर्य मंत्रों के विनियोग को भी योग की राष्ट्रवादी परम्पराओं के साथ जोड़ दिया। सूर्य मन्त्रों के उच्चारण से योगार्थी का सूर्य की बारह ऊर्जाओं से सायुज्य प्राप्त होता है। उसका तन मन और बुद्धि निर्मल होती है तथा इन आसनों के अभ्यास से उसे आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक तीनों प्रकार की ऊर्जायें एक साथ प्राप्त होती हैं। इसलिए ‘सूर्यनमस्कार’ का मन्त्रयोग ‘भारतराष्ट्र’ की राष्ट्रीय अमूल्य धरोहर है॥

भारत मूलतः सूर्योपासकों का देश होने के कारण ‘भारतराष्ट्र’ की अवधारणा सूर्य के साथ जुड़ी हुई है। यजुर्वेद में सूर्य को ‘राष्ट्र’ भी कहा गया है तथा ‘राष्ट्रपति’ भी। वैदिक साहित्य में प्रजावर्ग का भरण पोषण करने के कारण सूर्य को ‘भरत’ कहा गया है। सूर्य की ‘भरत’ संज्ञा होने के कारण इस देश के सूर्योपासक लोगों का देश ‘भारतवर्ष’ कहलाया। इस प्रकार ‘सूर्यनमस्कार’ के साथ भारतवासियों की राष्ट्रीय अस्मिता का इतिहास भी जुड़ा है। यही कारण है कि हमारे देश के तत्त्वद्रष्टा ऋषि मुनियों ने सूर्य के साथ सायुज्य रखते हुए योग की राष्ट्रवादी परम्पराओं को भी जोड़ा। सूर्य हमारा भरण पोषण ही नहीं करता बल्कि वह हमें अन्धकार से प्रकाश की ओर तथा अज्ञान से ज्ञान की ओर भी प्रेरित करता है। इसलिए शास्त्रों में कहा गया है कि जो लोग सूर्यको प्रतिदिन नमस्कार करते हैं, उन्हें सहस्रों जन्म तक दरिद्रता प्राप्त नहीं होती -

“आदित्यस्य नमस्कारं ये कुर्वन्ति दिने दिने।
जन्मान्तरसहस्रेषु दारिद्र्यं नोपजायते ।।”

‘सूर्य नमस्कार’ का इतिहास
जहां तक वर्तमान में प्रचलित ‘सूर्य नमस्कार’ आसन का सम्बन्ध है, पातञ्जल योगसूत्र का यह हिस्सा नहीं है और न ही इस आसन का अभ्यास करते हुए सूर्य सम्बन्धी मन्त्रों का प्रयोग करने का विधान योगशास्त्र के प्राचीन ग्रन्थों में कहीं मिलता है। किन्तु ‘तैत्तरीय आरण्यक’ में सूर्य नमस्कार से सम्बन्धित चौदह मन्त्र मिलते हैं, उन्हीं में पहले बारह मन्त्रों के अन्तिम भाग ‘सूर्य नमस्कार’ के बारह चरणों या आसनों में प्रयुक्त किया जाता है। इससे प्रतीत होता है कि सूर्योपासक योगसाधकों की एक स्वतन्त्र योग परम्परा का वैदिक काल में ही उदय हो चुका था, जिसका परम्परागत अवशेष यह ‘सूर्यनमस्कार’ नाम से प्रसिद्ध योग है।

वर्तमान ‘सूर्यनमस्कार’ के इतिहास के साथ महाराष्ट्र स्थित औंध के राजा भवनराव पन्त प्रतिनिधि का नाम विशेष रूप से जुड़ा है, जिन्होंने इस आसन को सन् 1920 में प्रचारित किया तथा इस पर ‘द टैन प्वाइन्ट वे टू हैल्थ’ शीर्षक से 1938 में अंग्रेजी में एक लघु पुस्तिका भी लिखी। औंध के राजा ने ही अपने राज्य के स्कूली पाठ्यक्रम में योग की शिक्षा को अनिवार्य किया। तभी से अधिकांश हिन्दू संगठन ‘सूर्य नमस्कार’ को योग की शिक्षा का आवश्यक अंग मानने लगे हैं. ‘सूर्य नमस्कार’ की यौगिक प्रक्रिया का शास्त्रीय रूप कैसा हो? इसके सम्बन्ध में भी तरह तरह के मतभेद दिखाई देते हैं। वर्तमान में ‘सूर्य नमस्कार’ की बारह यौगिक क्रियाओं के साथ सूर्यदेव सम्बन्धी संस्कृत के उपर्युक्त ‘तैत्तरीय आरण्यक’ में आये वैदिक मन्त्रों को भी जोड़ दिया गया है. इसलिए अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस पर यदि ‘सूर्य नमस्कार’ का भी प्रशिक्षण दिया जाता है तो वैदिक धर्म की मान्यताओं का भी सम्मान किया जाना चाहिए और इस आसन का अभ्यास केवल उन्हीं योगार्थियों को कराया जाना चाहिए जो संस्कृत भाषा के सही उच्चारण की क्षमता रखते हों और उन वैदिक मन्त्रों का अर्थ भी जानते हों तभी ‘सूर्य नमस्कार’ की यौगिक प्रक्रिया का सम्पूर्ण लाभ योगार्थियों को प्राप्त हो सकेगा। अन्यथा तो मन्त्रों के अशुद्ध उच्चारण से अनर्थ फल भी झेलना पड़ सकता है।

‘सूर्यनमस्कार’ के मन्त्र 
‘तैत्तरीय आरण्यक’ में सूर्यनमस्कार से सम्बन्धित चौदह मन्त्र मिलते हैं, उन्हीं में से पहले बारह मन्त्रों के अन्तिम भाग ‘सूर्यनमस्कार’ के बारह चरणों या आसनों में प्रयुक्त किया जाता है। प्रत्येक बार किए जाने वाले इन सूर्य मन्त्रों के उच्चारण से योगार्थी का सूर्य की बारह ऊर्जाओं से सायुज्य प्राप्त होता है। उसका तन मन और बुद्धि निर्मल होती है तथा इन आसनों के अभ्यास से उसे आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक तीनों प्रकार की ऊर्जायें प्राप्त होती हैं। वे चौदह वैदिक सूर्य मन्त्र निम्न हैं, जिनमें से पहले बारह मन्त्रों का उच्चारण ‘सूर्यनमस्कार’ के बारह चरणों का अभ्यास करते हुए किया जाता है -

ॐ मित्राय नमः, 2. ॐ रवये नमः, 3. ॐ सूर्याय नमः, 4.ॐ भानवे नमः, 5.ॐ खगाय नमः, 6. ॐ पूष्णे नमः,7. ॐ हिरण्यगर्भाय नमः, 8. ॐ मरीचये नमः, 9. ॐ आदित्याय नमः, 10.ॐ सवित्रे नमः, 11. ॐ अर्काय नमः, 12. ॐ भास्कराय नमः, 13. ॐमित्ररवि भ्यां नमः 14. ॐ सूर्यभानुभ्यां नमः

‘सूर्यनमस्कार’ के स्वास्थ्य सम्बन्धी लाभ -
सूर्यनमस्कार सर्वांग शारीरिक व्यायाम की अत्यन्त वैज्ञानिक यौगिक प्रक्रिया है जिसके करने से शरीर के सभी संस्थान, रक्त सञ्चरण, श्वास, पाचन, उत्सर्जन, नाड़ी तथा ग्रन्थों की क्रियाएं सशक्त होती हैं। यह शरीर के सभी अंगों, मांसपेशियों व नसों को क्रियाशील करता है तथा वात, पित्त तथा कफ को सन्तुलित करने में मदद करता है।

इस आसन का नियमित अभ्यास करने से पाचन सम्बन्धी समस्याओं जैसे अपच, कब्ज, बदहजमी, गैस, अफारा तथा भूख न लगना आदि बीमारियों से छुटकारा मिलता है। इससे शरीर की सभी महत्वपूर्ण ग्रन्थियों, जैसे पिट्यूटरी, थायरॉइड, पैराथायरॉइड, एड्रिनल, लीवर, पैंक्रियाज, ओवरी आदि की क्रियाएं सुचालित सन्तुलित रहती हैं। सूर्य नमस्कार से विटामिन-डी मिलता है, जिससे हड्डियां मजबूत होती हैं, आंखों की रोशनी बढती है,शरीर में खून का प्रवाह तेज होता है, जिससे ब्लड प्रेशर की बीमारी में आराम मिलता है। इसके नियमित अभ्यास से मोटापे को दूर किया जा सकता है,बालों को सफेद होने झड़ने व रूसी से बचाया जा सकता है और तनाव, अवसाद, एंग्जायटी, चिड़चिड़ापन आदि मानसिक बीमारियों से भी छुटकारा मिल सकता है।

‘सूर्यनमस्कार’ योग के बारह आसनों का सूर्य के संवत्सर चक्र के बारह महीनों से भी घनिष्ठ सम्बन्ध है। योगाचार्य सद्गुरु ने ‘सूर्यनमस्कार’ योग के द्वादश आसनों के औचित्य को बताते हुए कहा है कि सूर्य के द्वादश चक्रों का जिस तरह चक्रात्मक विकास होता है उसी तरह ‘सूर्यनमस्कार’ के आसनों का अभ्यास करते हुए हम अपने शरीर को इस योग्य बना सकते हैं ताकि सूर्य के द्वादश चक्रों के साथ हमारे शरीर की अनुकूलता बनी रहे-

"Surya Namaskar, which is known as “Sun Salutation” in English, is essentially about building a dimension within you where your physical cycles are in sync with the sun’s cycles, which run about twelve-and-a-quarter years. So it not by accident but by intent that it has been structured with twelve postures or twelve asanas in it. If your system is in a certain level of vibrancy and readiness, and in a good state of receptivity, then naturally your cycle will be in sync with the solar cycle."

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