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वेदवाणी

    यजुर्वेद में ग्रहों से सम्बन्धित ऋचाएं - क्रमशः -1 

    सूर्य- ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् (यजु. 33। 43, 34। 31) 

    चन्द्र- ॐ इमं देवा असपत्नं सुवध्यं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठ्याय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय। इमममुष्य पुत्रममुष्ये पुत्रमस्यै विश एष वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा।।
    (यजु. 10। 18)

    भौम- ॐ अग्निमूर्धा दिव: ककुत्पति: पृथिव्या अयम्। अपां रेतां सि जिन्वति।। (यजु. 3।12) 

    बुध- ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते सं सृजेधामयं च। अस्मिन्त्सधस्‍थे अध्‍युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यशमानश्च सीदत।। (यजु. 15।54) 

     गुरु- ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु। यद्दीदयच्छवस ऋतुप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्।। (यजु. 26।3)

    शुक्र- ॐ अन्नात्परिस्त्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपित्क्षत्रं पय: सोमं प्रजापति:। ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु।। (यजु. 19।75) 

    शनि- ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्त्रवन्तु न:।। (यजु. 36।12) 

    राहु- ॐ कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृध: सखा। कया शचिष्ठया वृता।। (यजु. 36।4)

    केतु- ॐ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे। समुषद्भिरजायथा:।। (यजु. 29।37)

    यजुर्वेद में ग्रहों से सम्बन्धित ऋचाएं - क्रमशः -1 

    सूर्य- ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् (यजु. 33। 43, 34। 31) 

    चन्द्र- ॐ इमं देवा असपत्नं सुवध्यं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठ्याय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय। इमममुष्य पुत्रममुष्ये पुत्रमस्यै विश एष वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा।।
    (यजु. 10। 18)

    भौम- ॐ अग्निमूर्धा दिव: ककुत्पति: पृथिव्या अयम्। अपां रेतां सि जिन्वति।। (यजु. 3।12) 

    बुध- ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते सं सृजेधामयं च। अस्मिन्त्सधस्‍थे अध्‍युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यशमानश्च सीदत।। (यजु. 15।54) 

     गुरु- ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु। यद्दीदयच्छवस ऋतुप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्।। (यजु. 26।3)

    शुक्र- ॐ अन्नात्परिस्त्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपित्क्षत्रं पय: सोमं प्रजापति:। ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु।। (यजु. 19।75) 

    शनि- ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्त्रवन्तु न:।। (यजु. 36।12) 

    राहु- ॐ कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृध: सखा। कया शचिष्ठया वृता।। (यजु. 36।4)

    केतु- ॐ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे। समुषद्भिरजायथा:।। (यजु. 29।37)

उपनिषद् - धारा

    ईशावास्योपनिषद् (मन्त्र-अनुवाद )-----1 (क्रमशः)

    (ईशावास्योपनिषद् शुक्लयजुर्वेदकाण्वसंहिता का ४०वां अध्याय है.  )

    ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते I

    पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते I I 1 I I

    ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

    = सच्चिदानन्दघन, अदः = वह परब्रह्म, पूर्णम् = सब प्रकार से पूर्ण हैं, इदम् = यह जगत् भी, पूर्णम् = पूर्ण (ही) है, (क्योंकि) पूर्णात् = पूर्ण से (परब्रह्म) से ही, पूर्णम् = यह पूर्ण, उदच्यते = उत्पन्न हुआ है, पूर्णस्य = पूर्ण के (से), पूर्णम् = पूर्ण को, आदाय = निकाल लेने पर (भी), पूर्णम् = पूर्ण, एव = ही, अवशिष्यते = बचता है.

    अर्थात् सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमेश्वर पुरुषोत्तम सब प्रकार से सदा-सर्वदा परिपूर्ण है. यह जगत् भी उस परब्रह्म से परिपूर्ण है क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है. इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत् पूर्ण है. इसलिए भी वह परिपूर्ण है. उस पूर्ण ब्रह्म से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही बच रहता है.

    त्रिविध ताप की शान्ति हो. ( ताप या दुःख तीन प्रकार के होते है - आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक )

    साभार - ईशादि नौ उपनिषद - गीता प्रेस            

    ईशावास्योपनिषद् (मन्त्र-अनुवाद )-----1 (क्रमशः)

    (ईशावास्योपनिषद् शुक्लयजुर्वेदकाण्वसंहिता का ४०वां अध्याय है.  )

    ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते I

    पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते I I 1 I I

    ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

    = सच्चिदानन्दघन, अदः = वह परब्रह्म, पूर्णम् = सब प्रकार से पूर्ण हैं, इदम् = यह जगत् भी, पूर्णम् = पूर्ण (ही) है, (क्योंकि) पूर्णात् = पूर्ण से (परब्रह्म) से ही, पूर्णम् = यह पूर्ण, उदच्यते = उत्पन्न हुआ है, पूर्णस्य = पूर्ण के (से), पूर्णम् = पूर्ण को, आदाय = निकाल लेने पर (भी), पूर्णम् = पूर्ण, एव = ही, अवशिष्यते = बचता है.

    अर्थात् सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमेश्वर पुरुषोत्तम सब प्रकार से सदा-सर्वदा परिपूर्ण है. यह जगत् भी उस परब्रह्म से परिपूर्ण है क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है. इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत् पूर्ण है. इसलिए भी वह परिपूर्ण है. उस पूर्ण ब्रह्म से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही बच रहता है.

    त्रिविध ताप की शान्ति हो. ( ताप या दुःख तीन प्रकार के होते है - आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक )

    साभार - ईशादि नौ उपनिषद - गीता प्रेस            

सुभाषितम्

    पुष्पे गन्धं तिले तैलं काष्ठेऽग्निं पयसि घृतम्।
    इक्षौ गुडं तथा देहे पश्याऽत्मानं विवेकत: ॥

     अर्थात् जैसे पुष्प मे गन्ध, तिल मे तैल, काष्ठ मे अग्नि, दूध मे घी और ईख मे गुड होता है वैसे शरीर मे परमात्मा विद्यमान है, विवेक द्वारा आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार करना चाहिये ।

    पात्रे त्यागी गुणे रागी संविभागी च बन्धुषु।
    शास्त्रे बोद्धा रणे योद्धा स वै पुरुष पञ्चलक्षणः उच्चते।।

    अर्थात् जो उचित पात्र के लिए त्याग करता है, दूसरों के गुणों को स्वीकार करता है, अपने सुख-दुःख को बन्धु-बान्धव के साथ बाँटता है, शास्त्रों से ज्ञान ग्रहण करता है, युद्ध में वीरता का प्रदर्शन करता है, उसे ही सच्चे अर्थ में पुरुष कहा जाता है।

    विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
    यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्।।

    अर्थात् विपत्तिकाल में धैर्य धारण करना और समृद्धिकाल में क्षमाशीलता, सभा में वचन नैपुण्य, युद्धभूमि में शौर्य, यश प्राप्ति में विशेष रूचि और वेदाध्ययन कार्य में विशेष आसक्ति निश्चयपूर्वक ये उपर्युक्त सभी बातें महापुरुषों में स्वभाव से ही सिद्ध होती हैं।

    सौजन्य से - श्री कुलदीप पुरोहित (गुजरात)

    नैवाकृतिः फलति नैव कुलं न शीलं,

    विद्यापि नैव न च यत्नकृतापि सेवा।

    भाग्यानि पूर्वतपसा किल सञ्चितानि,

    काले फलन्ति पुरुषस्य यथैव वृक्षाः।।

    अन्वयः -

    आकृतिः न फलति एव । कुलं न (फलति) एव । शीलं न (फलति एव) । विद्या अपि न (फलति) एव । यत्नकृता सेवा अपि च न (फलति एव) । यथा वृक्षाः काले फलन्ति (तथा एव) पुरुषस्य पूर्वतपसा सञ्चितानि भाग्यानि (काले फलन्ति)।

     भावानुवादः -

    --आकृतिः,कुलं,शीलं,विद्या वा यत्नकृता सेवा-  सर्वाणि एतानि न फलीभूतानि भवन्ति। किन्तु यथा वृक्षः योग्यकाले  फलानि ददाति तथैव पूर्वतपसा सञ्चितानि  कर्माणि योग्यकाले एव पुरुषाय फलं ददाति।

    हिन्दी अनुवादः -

    --आकृति, कुल, चारित्र, विद्या या यत्नपूर्वक की गई सेवा- इनमें से कुछ भी तत्काल फलीभूत होता नही है ; लेकिन जैसे वृक्ष समय आने पर ही फल देते है, वैसे ही पूर्व में किए गए तप से सञ्चित हुए कर्म समय पर मनुष्य को फल देते है।

    पुष्पे गन्धं तिले तैलं काष्ठेऽग्निं पयसि घृतम्।
    इक्षौ गुडं तथा देहे पश्याऽत्मानं विवेकत: ॥

     अर्थात् जैसे पुष्प मे गन्ध, तिल मे तैल, काष्ठ मे अग्नि, दूध मे घी और ईख मे गुड होता है वैसे शरीर मे परमात्मा विद्यमान है, विवेक द्वारा आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार करना चाहिये ।

    पात्रे त्यागी गुणे रागी संविभागी च बन्धुषु।
    शास्त्रे बोद्धा रणे योद्धा स वै पुरुष पञ्चलक्षणः उच्चते।।

    अर्थात् जो उचित पात्र के लिए त्याग करता है, दूसरों के गुणों को स्वीकार करता है, अपने सुख-दुःख को बन्धु-बान्धव के साथ बाँटता है, शास्त्रों से ज्ञान ग्रहण करता है, युद्ध में वीरता का प्रदर्शन करता है, उसे ही सच्चे अर्थ में पुरुष कहा जाता है।

    विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
    यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्।।

    अर्थात् विपत्तिकाल में धैर्य धारण करना और समृद्धिकाल में क्षमाशीलता, सभा में वचन नैपुण्य, युद्धभूमि में शौर्य, यश प्राप्ति में विशेष रूचि और वेदाध्ययन कार्य में विशेष आसक्ति निश्चयपूर्वक ये उपर्युक्त सभी बातें महापुरुषों में स्वभाव से ही सिद्ध होती हैं।

    सौजन्य से - श्री कुलदीप पुरोहित (गुजरात)

    नैवाकृतिः फलति नैव कुलं न शीलं,

    विद्यापि नैव न च यत्नकृतापि सेवा।

    भाग्यानि पूर्वतपसा किल सञ्चितानि,

    काले फलन्ति पुरुषस्य यथैव वृक्षाः।।

    अन्वयः -

    आकृतिः न फलति एव । कुलं न (फलति) एव । शीलं न (फलति एव) । विद्या अपि न (फलति) एव । यत्नकृता सेवा अपि च न (फलति एव) । यथा वृक्षाः काले फलन्ति (तथा एव) पुरुषस्य पूर्वतपसा सञ्चितानि भाग्यानि (काले फलन्ति)।

     भावानुवादः -

    --आकृतिः,कुलं,शीलं,विद्या वा यत्नकृता सेवा-  सर्वाणि एतानि न फलीभूतानि भवन्ति। किन्तु यथा वृक्षः योग्यकाले  फलानि ददाति तथैव पूर्वतपसा सञ्चितानि  कर्माणि योग्यकाले एव पुरुषाय फलं ददाति।

    हिन्दी अनुवादः -

    --आकृति, कुल, चारित्र, विद्या या यत्नपूर्वक की गई सेवा- इनमें से कुछ भी तत्काल फलीभूत होता नही है ; लेकिन जैसे वृक्ष समय आने पर ही फल देते है, वैसे ही पूर्व में किए गए तप से सञ्चित हुए कर्म समय पर मनुष्य को फल देते है।

सूर्यनमस्कार : आसन के द्वादश चरण 

  • मोहन चन्द तिवारी

‘सूर्यनमस्कार’ आसन के बारह चरण 
‘सूर्यनमस्कार’ को सर्वांग व्यायाम भी कहा जाता है। इसके लिये प्रातःकाल सूर्योदय का समय सर्वोत्तम माना गया है। ‘सूर्यनमस्कार’ का अभ्यास सदैव खुली हवादार जगह पर कम्बल का आसन बिछाकर खाली पेट करना चाहिये। इससे मन शान्त और प्रसन्न होता है। ‘सूर्यनमस्कार’ आसन के बारह चरण या स्थितियां हैं, जिनका अभ्यास इस प्रकार किया जाता है-

1. प्रथम चरण - ‘स्थितप्रार्थनासन’
सूर्य-नमस्कार के प्रथम चरण की स्थिति ‘स्थितप्रार्थनासन’ की है। सावधान की मुद्रा में खड़े हो जायें।अब दोनों हथेलियों को परस्पर जोड़कर प्रणाम की मुद्रा में हृदय पर रख लें। दोनों हाथों की अँगुलियां परस्पर सटी हों और अंगूठा छाती से चिपका हुआ हो। इस स्थिति में आपकी कुहनियां सामने की ऒर बाहर निकल आयेंगी । अब आँखें बन्द कर दोनों हथेलियों का पारस्परिक दबाव बढ़ायें। श्वास-प्रक्रिया निर्बाध चलने दें। इस समय 'ॐ मित्राय नमः'  इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

2. द्वितीय चरण - ‘हस्तोत्तानासन’ या ‘अर्द्धचन्द्रासन’
प्रथम चरण की स्थिति में जुड़ी हुई हथेलियों को खोलते हुए ऊपर की ओर तानें तथा श्वास भरते हुए कमर को पीछे की ऒर मोडें। गर्दन तथा रीढ़ की हड्डियों पर पड़ने वाले तनाव को महसूस करें। अपनी क्षमता के अनुसार ही पीछे झुकें और यथासाध्य कुम्भक करते हुए झुके रहें। इस समय 'ॐ रवये नमः' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

3. तृतीय चरण - ‘हस्तपादासन’ या ‘पादहस्तासन’
दूसरे चरण की स्थिति से सीधे होते हुए रेचक (निःश्वास) करें तथा उसी प्रवाह में सामने की ओर झुकते चले जायें। दोनों हथेलियों को दोनों पञ्जों के पास जमीन पर जमा दें। घुटने सीधे रखें तथा मस्तक को घुटनों से चिपका दें और यथाशक्ति बाह्य-कुम्भक करें। नवप्रशिक्षु धीरे-धीरे इस अभ्यास को करें और प्रारम्भ में केवल हथेलियों को जमीन से स्पर्श कराने की ही कोशिश करें। इस समय ‘ॐ सूर्याय नमः ' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

4.चतुर्थ चरण - ‘एकपादप्रसारणासन’
तीसरे चरण की स्थिति से भूमि पर दोनों हथेलियां जमाये हुए अपना दायां पैर पीछे की ओर ले जायें। इस प्रयास में आपका बायां पैर आपकी छाती के नीचे घुटनों से मुड़ जाएगा, जिसे अपनी छाती से दबाते हुए गर्दन पीछे की ओर मोडकर ऊपर आसमान की ओर देखें। दायां घुटना जमीन पर सटा हुआ तथा पञ्जा अंगुलियों पर खडा होगा। यह ध्यान रखें कि हथेलियां जमीन से उठने न पायें। श्वास-प्रक्रिया सामान्य रूप से चलती रहे। इस समय 'ॐ भानवे नमः ' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

5. पञ्चम चरण - ‘भूधरासन’ या ‘दण्डासन’
‘एकपादप्रसारणासन’ की दशा से अपने बाएं पैर को भी पीछे ले जायें और दाएं पैर के साथ मिला लें। हाथों को कन्धों तक सीधा रखें । इस स्थिति में आपका शरीर भूमि पर त्रिभुज का आकार बनाता है , जिसमें आपके हाथ लम्बवत् और शरीर कर्णवत् होते हैं। पूरा भार हथेलियों और पञ्जों पर रहता है। श्वास-प्रक्रिया सामान्य रहनी चाहिये अथवा कुहनियों को मोड़कर पूरे शरीर को भूमि पर समानान्तर रखना चाहिये। यह ‘दण्डासन’ है। इस समय 'ॐ खगाय नमः' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

6. षष्ठ चरण - ‘साष्टाङ्ग प्रणिपात’
पञ्चम अवस्था अर्थात् ‘भूधरासन’ से श्वास छोड़ते हुए अपने शरीर को धीरे-धीरे नीचे झुकायें। कुहनियां मुड़कर बगलों में चिपक जानी चाहिये। दोनों पञ्जे , घुटने, छाती, हथेलियां तथा ठोड़ी जमीन पर एवं कमर तथा नितम्ब उपर उठा होना चाहिये। इस समय 'ॐ पूष्णे नमः ' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

7. सप्तम चरण - ‘सर्पासन’ या ‘भुजङ्गासन’
छठे चरण की स्थिति में थोड़ा सा परिवर्तन करते हुए नाभि से नीचे के भाग को भूमि पर लिटाकर तान दें। अब हाथों को सीधा करते हुए नाभि से उपरी हिस्से को ऊपर उठाएं। श्वास भरते हुए सामने देखें या गरदन पीछे मोड़कर ऊपर आसमान की ऒर देखने की चेष्टा करें । ध्यान रखें, आपके हाथ पूरी तरह सीधे हों या यदि कुहनी से मुडे हों, तो कुहनियां आपकी बगलों से चिपकी होनी चाहिए। इस समय ' ॐ हिरण्यगर्भाय नमः ' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

8. अष्टम चरण - ‘पर्वतासन’
सप्तम चरण की स्थिति से अपनी कमर और पीठ को ऊपर उठायें। दो पञ्जों और हथेलियों पर पूरा वजन डालकर नितम्बों को पर्वतशृङ्ग की भांति ऊपर उठा दें तथा गरदन को नीचे झुकाते हुए अपनी नाभि को देखें। इस समय ' ॐ मरीचये नम: ' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

9. नवम चरण - ‘एकपादप्रसारणासन’ (चतुर्थ चरण)
आठवें चरण की स्थिति से निकलते हुए अपना दायां पैर दोनों हाथों के बीच दाहिनी हथेली के पास लाकर जमा दें। कमर को नीचे दबाते हुए गरदन पीछे की ओर मोड़कर आसमान की ओर देखें। बायां घुटना जमीन पर टिका होना चाहिए। इस समय 'ॐ आदित्याय नमः'  इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

10. दशम चरण – ‘हस्तपादासन’ (तृतीय चरण)
नवम चरण की स्थिति के बाद अपने बाएं पैर को भी आगे दाहिने पैर के पास ले आयें। हथेलियाँ जमीन पर टिकी रहने दें । सांस बाहर निकालकर अपने मस्तक को घुटनों से सटा दें । ध्यान रखें कि घुटने मुड़ें नहीं, भले ही आपका मस्तक उन्हें स्पर्श न करता हो। इस समय 'ॐ सवित्रे नमः' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

11. एकादश चरण - ‘हस्तोत्तानासन’ या ‘अर्द्धचन्द्रासन’ ( द्वितीय चरण )
दशम चरण की स्थिति से श्वास भरते हुए सीधे खड़े हों। दोनों हाथों की खुली हथेलियों को सिर के ऊपर ले जाते हुए पीछे की ऒर तान दें। यथासम्भव कमर को भी पीछे की ओर मोड़ें। इस समय 'ॐ अर्काय नमः' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

12. द्वादश चरण -‘स्थितप्रार्थनासन’ ( प्रथम चरण )
ग्यारहवें चरण की स्थिति से हाथों को आगे लाते हुए सीधे हो जायें। दोनों हाथों को नमस्कार की मुद्रा में वक्षःस्थल पर जोड़ लें । सभी उंगलियां परस्पर जुडी हुईं हों तथा अंगूठा छाती से सटा हुआ हो । कुहनियों को बाहर की तरफ निकालते हुए दोनों हथेलियों पर पारस्परिक दबाव दें। इस समय 'ॐ भास्कराय नमः' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

 

सूर्यनमस्कार : आसन के द्वादश चरण 

  • मोहन चन्द तिवारी

‘सूर्यनमस्कार’ आसन के बारह चरण 
‘सूर्यनमस्कार’ को सर्वांग व्यायाम भी कहा जाता है। इसके लिये प्रातःकाल सूर्योदय का समय सर्वोत्तम माना गया है। ‘सूर्यनमस्कार’ का अभ्यास सदैव खुली हवादार जगह पर कम्बल का आसन बिछाकर खाली पेट करना चाहिये। इससे मन शान्त और प्रसन्न होता है। ‘सूर्यनमस्कार’ आसन के बारह चरण या स्थितियां हैं, जिनका अभ्यास इस प्रकार किया जाता है-

1. प्रथम चरण - ‘स्थितप्रार्थनासन’
सूर्य-नमस्कार के प्रथम चरण की स्थिति ‘स्थितप्रार्थनासन’ की है। सावधान की मुद्रा में खड़े हो जायें।अब दोनों हथेलियों को परस्पर जोड़कर प्रणाम की मुद्रा में हृदय पर रख लें। दोनों हाथों की अँगुलियां परस्पर सटी हों और अंगूठा छाती से चिपका हुआ हो। इस स्थिति में आपकी कुहनियां सामने की ऒर बाहर निकल आयेंगी । अब आँखें बन्द कर दोनों हथेलियों का पारस्परिक दबाव बढ़ायें। श्वास-प्रक्रिया निर्बाध चलने दें। इस समय 'ॐ मित्राय नमः'  इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

2. द्वितीय चरण - ‘हस्तोत्तानासन’ या ‘अर्द्धचन्द्रासन’
प्रथम चरण की स्थिति में जुड़ी हुई हथेलियों को खोलते हुए ऊपर की ओर तानें तथा श्वास भरते हुए कमर को पीछे की ऒर मोडें। गर्दन तथा रीढ़ की हड्डियों पर पड़ने वाले तनाव को महसूस करें। अपनी क्षमता के अनुसार ही पीछे झुकें और यथासाध्य कुम्भक करते हुए झुके रहें। इस समय 'ॐ रवये नमः' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

3. तृतीय चरण - ‘हस्तपादासन’ या ‘पादहस्तासन’
दूसरे चरण की स्थिति से सीधे होते हुए रेचक (निःश्वास) करें तथा उसी प्रवाह में सामने की ओर झुकते चले जायें। दोनों हथेलियों को दोनों पञ्जों के पास जमीन पर जमा दें। घुटने सीधे रखें तथा मस्तक को घुटनों से चिपका दें और यथाशक्ति बाह्य-कुम्भक करें। नवप्रशिक्षु धीरे-धीरे इस अभ्यास को करें और प्रारम्भ में केवल हथेलियों को जमीन से स्पर्श कराने की ही कोशिश करें। इस समय ‘ॐ सूर्याय नमः ' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

4.चतुर्थ चरण - ‘एकपादप्रसारणासन’
तीसरे चरण की स्थिति से भूमि पर दोनों हथेलियां जमाये हुए अपना दायां पैर पीछे की ओर ले जायें। इस प्रयास में आपका बायां पैर आपकी छाती के नीचे घुटनों से मुड़ जाएगा, जिसे अपनी छाती से दबाते हुए गर्दन पीछे की ओर मोडकर ऊपर आसमान की ओर देखें। दायां घुटना जमीन पर सटा हुआ तथा पञ्जा अंगुलियों पर खडा होगा। यह ध्यान रखें कि हथेलियां जमीन से उठने न पायें। श्वास-प्रक्रिया सामान्य रूप से चलती रहे। इस समय 'ॐ भानवे नमः ' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

5. पञ्चम चरण - ‘भूधरासन’ या ‘दण्डासन’
‘एकपादप्रसारणासन’ की दशा से अपने बाएं पैर को भी पीछे ले जायें और दाएं पैर के साथ मिला लें। हाथों को कन्धों तक सीधा रखें । इस स्थिति में आपका शरीर भूमि पर त्रिभुज का आकार बनाता है , जिसमें आपके हाथ लम्बवत् और शरीर कर्णवत् होते हैं। पूरा भार हथेलियों और पञ्जों पर रहता है। श्वास-प्रक्रिया सामान्य रहनी चाहिये अथवा कुहनियों को मोड़कर पूरे शरीर को भूमि पर समानान्तर रखना चाहिये। यह ‘दण्डासन’ है। इस समय 'ॐ खगाय नमः' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

6. षष्ठ चरण - ‘साष्टाङ्ग प्रणिपात’
पञ्चम अवस्था अर्थात् ‘भूधरासन’ से श्वास छोड़ते हुए अपने शरीर को धीरे-धीरे नीचे झुकायें। कुहनियां मुड़कर बगलों में चिपक जानी चाहिये। दोनों पञ्जे , घुटने, छाती, हथेलियां तथा ठोड़ी जमीन पर एवं कमर तथा नितम्ब उपर उठा होना चाहिये। इस समय 'ॐ पूष्णे नमः ' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

7. सप्तम चरण - ‘सर्पासन’ या ‘भुजङ्गासन’
छठे चरण की स्थिति में थोड़ा सा परिवर्तन करते हुए नाभि से नीचे के भाग को भूमि पर लिटाकर तान दें। अब हाथों को सीधा करते हुए नाभि से उपरी हिस्से को ऊपर उठाएं। श्वास भरते हुए सामने देखें या गरदन पीछे मोड़कर ऊपर आसमान की ऒर देखने की चेष्टा करें । ध्यान रखें, आपके हाथ पूरी तरह सीधे हों या यदि कुहनी से मुडे हों, तो कुहनियां आपकी बगलों से चिपकी होनी चाहिए। इस समय ' ॐ हिरण्यगर्भाय नमः ' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

8. अष्टम चरण - ‘पर्वतासन’
सप्तम चरण की स्थिति से अपनी कमर और पीठ को ऊपर उठायें। दो पञ्जों और हथेलियों पर पूरा वजन डालकर नितम्बों को पर्वतशृङ्ग की भांति ऊपर उठा दें तथा गरदन को नीचे झुकाते हुए अपनी नाभि को देखें। इस समय ' ॐ मरीचये नम: ' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

9. नवम चरण - ‘एकपादप्रसारणासन’ (चतुर्थ चरण)
आठवें चरण की स्थिति से निकलते हुए अपना दायां पैर दोनों हाथों के बीच दाहिनी हथेली के पास लाकर जमा दें। कमर को नीचे दबाते हुए गरदन पीछे की ओर मोड़कर आसमान की ओर देखें। बायां घुटना जमीन पर टिका होना चाहिए। इस समय 'ॐ आदित्याय नमः'  इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

10. दशम चरण – ‘हस्तपादासन’ (तृतीय चरण)
नवम चरण की स्थिति के बाद अपने बाएं पैर को भी आगे दाहिने पैर के पास ले आयें। हथेलियाँ जमीन पर टिकी रहने दें । सांस बाहर निकालकर अपने मस्तक को घुटनों से सटा दें । ध्यान रखें कि घुटने मुड़ें नहीं, भले ही आपका मस्तक उन्हें स्पर्श न करता हो। इस समय 'ॐ सवित्रे नमः' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

11. एकादश चरण - ‘हस्तोत्तानासन’ या ‘अर्द्धचन्द्रासन’ ( द्वितीय चरण )
दशम चरण की स्थिति से श्वास भरते हुए सीधे खड़े हों। दोनों हाथों की खुली हथेलियों को सिर के ऊपर ले जाते हुए पीछे की ऒर तान दें। यथासम्भव कमर को भी पीछे की ओर मोड़ें। इस समय 'ॐ अर्काय नमः' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

12. द्वादश चरण -‘स्थितप्रार्थनासन’ ( प्रथम चरण )
ग्यारहवें चरण की स्थिति से हाथों को आगे लाते हुए सीधे हो जायें। दोनों हाथों को नमस्कार की मुद्रा में वक्षःस्थल पर जोड़ लें । सभी उंगलियां परस्पर जुडी हुईं हों तथा अंगूठा छाती से सटा हुआ हो । कुहनियों को बाहर की तरफ निकालते हुए दोनों हथेलियों पर पारस्परिक दबाव दें। इस समय 'ॐ भास्कराय नमः' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

 

सूर्यनमस्कार : आसन के द्वादश चरण 

  • मोहन चन्द तिवारी

‘सूर्यनमस्कार’ आसन के बारह चरण 
‘सूर्यनमस्कार’ को सर्वांग व्यायाम भी कहा जाता है। इसके लिये प्रातःकाल सूर्योदय का समय सर्वोत्तम माना गया है। ‘सूर्यनमस्कार’ का अभ्यास सदैव खुली हवादार जगह पर कम्बल का आसन बिछाकर खाली पेट करना चाहिये। इससे मन शान्त और प्रसन्न होता है। ‘सूर्यनमस्कार’ आसन के बारह चरण या स्थितियां हैं, जिनका अभ्यास इस प्रकार किया जाता है-

1. प्रथम चरण - ‘स्थितप्रार्थनासन’
सूर्य-नमस्कार के प्रथम चरण की स्थिति ‘स्थितप्रार्थनासन’ की है। सावधान की मुद्रा में खड़े हो जायें।अब दोनों हथेलियों को परस्पर जोड़कर प्रणाम की मुद्रा में हृदय पर रख लें। दोनों हाथों की अँगुलियां परस्पर सटी हों और अंगूठा छाती से चिपका हुआ हो। इस स्थिति में आपकी कुहनियां सामने की ऒर बाहर निकल आयेंगी । अब आँखें बन्द कर दोनों हथेलियों का पारस्परिक दबाव बढ़ायें। श्वास-प्रक्रिया निर्बाध चलने दें। इस समय 'ॐ मित्राय नमः'  इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

2. द्वितीय चरण - ‘हस्तोत्तानासन’ या ‘अर्द्धचन्द्रासन’
प्रथम चरण की स्थिति में जुड़ी हुई हथेलियों को खोलते हुए ऊपर की ओर तानें तथा श्वास भरते हुए कमर को पीछे की ऒर मोडें। गर्दन तथा रीढ़ की हड्डियों पर पड़ने वाले तनाव को महसूस करें। अपनी क्षमता के अनुसार ही पीछे झुकें और यथासाध्य कुम्भक करते हुए झुके रहें। इस समय 'ॐ रवये नमः' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

3. तृतीय चरण - ‘हस्तपादासन’ या ‘पादहस्तासन’
दूसरे चरण की स्थिति से सीधे होते हुए रेचक (निःश्वास) करें तथा उसी प्रवाह में सामने की ओर झुकते चले जायें। दोनों हथेलियों को दोनों पञ्जों के पास जमीन पर जमा दें। घुटने सीधे रखें तथा मस्तक को घुटनों से चिपका दें और यथाशक्ति बाह्य-कुम्भक करें। नवप्रशिक्षु धीरे-धीरे इस अभ्यास को करें और प्रारम्भ में केवल हथेलियों को जमीन से स्पर्श कराने की ही कोशिश करें। इस समय ‘ॐ सूर्याय नमः ' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

4.चतुर्थ चरण - ‘एकपादप्रसारणासन’
तीसरे चरण की स्थिति से भूमि पर दोनों हथेलियां जमाये हुए अपना दायां पैर पीछे की ओर ले जायें। इस प्रयास में आपका बायां पैर आपकी छाती के नीचे घुटनों से मुड़ जाएगा, जिसे अपनी छाती से दबाते हुए गर्दन पीछे की ओर मोडकर ऊपर आसमान की ओर देखें। दायां घुटना जमीन पर सटा हुआ तथा पञ्जा अंगुलियों पर खडा होगा। यह ध्यान रखें कि हथेलियां जमीन से उठने न पायें। श्वास-प्रक्रिया सामान्य रूप से चलती रहे। इस समय 'ॐ भानवे नमः ' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

5. पञ्चम चरण - ‘भूधरासन’ या ‘दण्डासन’
‘एकपादप्रसारणासन’ की दशा से अपने बाएं पैर को भी पीछे ले जायें और दाएं पैर के साथ मिला लें। हाथों को कन्धों तक सीधा रखें । इस स्थिति में आपका शरीर भूमि पर त्रिभुज का आकार बनाता है , जिसमें आपके हाथ लम्बवत् और शरीर कर्णवत् होते हैं। पूरा भार हथेलियों और पञ्जों पर रहता है। श्वास-प्रक्रिया सामान्य रहनी चाहिये अथवा कुहनियों को मोड़कर पूरे शरीर को भूमि पर समानान्तर रखना चाहिये। यह ‘दण्डासन’ है। इस समय 'ॐ खगाय नमः' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

6. षष्ठ चरण - ‘साष्टाङ्ग प्रणिपात’
पञ्चम अवस्था अर्थात् ‘भूधरासन’ से श्वास छोड़ते हुए अपने शरीर को धीरे-धीरे नीचे झुकायें। कुहनियां मुड़कर बगलों में चिपक जानी चाहिये। दोनों पञ्जे , घुटने, छाती, हथेलियां तथा ठोड़ी जमीन पर एवं कमर तथा नितम्ब उपर उठा होना चाहिये। इस समय 'ॐ पूष्णे नमः ' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

7. सप्तम चरण - ‘सर्पासन’ या ‘भुजङ्गासन’
छठे चरण की स्थिति में थोड़ा सा परिवर्तन करते हुए नाभि से नीचे के भाग को भूमि पर लिटाकर तान दें। अब हाथों को सीधा करते हुए नाभि से उपरी हिस्से को ऊपर उठाएं। श्वास भरते हुए सामने देखें या गरदन पीछे मोड़कर ऊपर आसमान की ऒर देखने की चेष्टा करें । ध्यान रखें, आपके हाथ पूरी तरह सीधे हों या यदि कुहनी से मुडे हों, तो कुहनियां आपकी बगलों से चिपकी होनी चाहिए। इस समय ' ॐ हिरण्यगर्भाय नमः ' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

8. अष्टम चरण - ‘पर्वतासन’
सप्तम चरण की स्थिति से अपनी कमर और पीठ को ऊपर उठायें। दो पञ्जों और हथेलियों पर पूरा वजन डालकर नितम्बों को पर्वतशृङ्ग की भांति ऊपर उठा दें तथा गरदन को नीचे झुकाते हुए अपनी नाभि को देखें। इस समय ' ॐ मरीचये नम: ' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

9. नवम चरण - ‘एकपादप्रसारणासन’ (चतुर्थ चरण)
आठवें चरण की स्थिति से निकलते हुए अपना दायां पैर दोनों हाथों के बीच दाहिनी हथेली के पास लाकर जमा दें। कमर को नीचे दबाते हुए गरदन पीछे की ओर मोड़कर आसमान की ओर देखें। बायां घुटना जमीन पर टिका होना चाहिए। इस समय 'ॐ आदित्याय नमः'  इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

10. दशम चरण – ‘हस्तपादासन’ (तृतीय चरण)
नवम चरण की स्थिति के बाद अपने बाएं पैर को भी आगे दाहिने पैर के पास ले आयें। हथेलियाँ जमीन पर टिकी रहने दें । सांस बाहर निकालकर अपने मस्तक को घुटनों से सटा दें । ध्यान रखें कि घुटने मुड़ें नहीं, भले ही आपका मस्तक उन्हें स्पर्श न करता हो। इस समय 'ॐ सवित्रे नमः' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

11. एकादश चरण - ‘हस्तोत्तानासन’ या ‘अर्द्धचन्द्रासन’ ( द्वितीय चरण )
दशम चरण की स्थिति से श्वास भरते हुए सीधे खड़े हों। दोनों हाथों की खुली हथेलियों को सिर के ऊपर ले जाते हुए पीछे की ऒर तान दें। यथासम्भव कमर को भी पीछे की ओर मोड़ें। इस समय 'ॐ अर्काय नमः' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

12. द्वादश चरण -‘स्थितप्रार्थनासन’ ( प्रथम चरण )
ग्यारहवें चरण की स्थिति से हाथों को आगे लाते हुए सीधे हो जायें। दोनों हाथों को नमस्कार की मुद्रा में वक्षःस्थल पर जोड़ लें । सभी उंगलियां परस्पर जुडी हुईं हों तथा अंगूठा छाती से सटा हुआ हो । कुहनियों को बाहर की तरफ निकालते हुए दोनों हथेलियों पर पारस्परिक दबाव दें। इस समय 'ॐ भास्कराय नमः' इस मन्त्र का जप करना चाहिए।

 

टिप्पणियाँ :
  • कैलाश द्विवेदी

    शोभनम्

  • कैलाश द्विवेदी

    शोभनम्

  • सूर्य नमस्कार में रेखाचित्र भी दिये जायें।

  • सूर्य नमस्कार में रेखाचित्र भी दिये जायें।

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