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वेदवाणी

    यजुर्वेद में ग्रहों से सम्बन्धित ऋचाएं - क्रमशः -1 

    सूर्य- ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् (यजु. 33। 43, 34। 31) 

    चन्द्र- ॐ इमं देवा असपत्नं सुवध्यं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठ्याय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय। इमममुष्य पुत्रममुष्ये पुत्रमस्यै विश एष वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा।।
    (यजु. 10। 18)

    भौम- ॐ अग्निमूर्धा दिव: ककुत्पति: पृथिव्या अयम्। अपां रेतां सि जिन्वति।। (यजु. 3।12) 

    बुध- ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते सं सृजेधामयं च। अस्मिन्त्सधस्‍थे अध्‍युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यशमानश्च सीदत।। (यजु. 15।54) 

     गुरु- ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु। यद्दीदयच्छवस ऋतुप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्।। (यजु. 26।3)

    शुक्र- ॐ अन्नात्परिस्त्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपित्क्षत्रं पय: सोमं प्रजापति:। ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु।। (यजु. 19।75) 

    शनि- ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्त्रवन्तु न:।। (यजु. 36।12) 

    राहु- ॐ कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृध: सखा। कया शचिष्ठया वृता।। (यजु. 36।4)

    केतु- ॐ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे। समुषद्भिरजायथा:।। (यजु. 29।37)

    यजुर्वेद में ग्रहों से सम्बन्धित ऋचाएं - क्रमशः -1 

    सूर्य- ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् (यजु. 33। 43, 34। 31) 

    चन्द्र- ॐ इमं देवा असपत्नं सुवध्यं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठ्याय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय। इमममुष्य पुत्रममुष्ये पुत्रमस्यै विश एष वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा।।
    (यजु. 10। 18)

    भौम- ॐ अग्निमूर्धा दिव: ककुत्पति: पृथिव्या अयम्। अपां रेतां सि जिन्वति।। (यजु. 3।12) 

    बुध- ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते सं सृजेधामयं च। अस्मिन्त्सधस्‍थे अध्‍युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यशमानश्च सीदत।। (यजु. 15।54) 

     गुरु- ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु। यद्दीदयच्छवस ऋतुप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्।। (यजु. 26।3)

    शुक्र- ॐ अन्नात्परिस्त्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपित्क्षत्रं पय: सोमं प्रजापति:। ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु।। (यजु. 19।75) 

    शनि- ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्त्रवन्तु न:।। (यजु. 36।12) 

    राहु- ॐ कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृध: सखा। कया शचिष्ठया वृता।। (यजु. 36।4)

    केतु- ॐ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे। समुषद्भिरजायथा:।। (यजु. 29।37)

उपनिषद् - धारा

    ईशावास्योपनिषद् (मन्त्र-अनुवाद )-----1 (क्रमशः)

    (ईशावास्योपनिषद् शुक्लयजुर्वेदकाण्वसंहिता का ४०वां अध्याय है.  )

    ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते I

    पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते I I 1 I I

    ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

    = सच्चिदानन्दघन, अदः = वह परब्रह्म, पूर्णम् = सब प्रकार से पूर्ण हैं, इदम् = यह जगत् भी, पूर्णम् = पूर्ण (ही) है, (क्योंकि) पूर्णात् = पूर्ण से (परब्रह्म) से ही, पूर्णम् = यह पूर्ण, उदच्यते = उत्पन्न हुआ है, पूर्णस्य = पूर्ण के (से), पूर्णम् = पूर्ण को, आदाय = निकाल लेने पर (भी), पूर्णम् = पूर्ण, एव = ही, अवशिष्यते = बचता है.

    अर्थात् सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमेश्वर पुरुषोत्तम सब प्रकार से सदा-सर्वदा परिपूर्ण है. यह जगत् भी उस परब्रह्म से परिपूर्ण है क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है. इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत् पूर्ण है. इसलिए भी वह परिपूर्ण है. उस पूर्ण ब्रह्म से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही बच रहता है.

    त्रिविध ताप की शान्ति हो. ( ताप या दुःख तीन प्रकार के होते है - आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक )

    साभार - ईशादि नौ उपनिषद - गीता प्रेस            

    ईशावास्योपनिषद् (मन्त्र-अनुवाद )-----1 (क्रमशः)

    (ईशावास्योपनिषद् शुक्लयजुर्वेदकाण्वसंहिता का ४०वां अध्याय है.  )

    ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते I

    पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते I I 1 I I

    ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

    = सच्चिदानन्दघन, अदः = वह परब्रह्म, पूर्णम् = सब प्रकार से पूर्ण हैं, इदम् = यह जगत् भी, पूर्णम् = पूर्ण (ही) है, (क्योंकि) पूर्णात् = पूर्ण से (परब्रह्म) से ही, पूर्णम् = यह पूर्ण, उदच्यते = उत्पन्न हुआ है, पूर्णस्य = पूर्ण के (से), पूर्णम् = पूर्ण को, आदाय = निकाल लेने पर (भी), पूर्णम् = पूर्ण, एव = ही, अवशिष्यते = बचता है.

    अर्थात् सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमेश्वर पुरुषोत्तम सब प्रकार से सदा-सर्वदा परिपूर्ण है. यह जगत् भी उस परब्रह्म से परिपूर्ण है क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है. इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत् पूर्ण है. इसलिए भी वह परिपूर्ण है. उस पूर्ण ब्रह्म से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही बच रहता है.

    त्रिविध ताप की शान्ति हो. ( ताप या दुःख तीन प्रकार के होते है - आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक )

    साभार - ईशादि नौ उपनिषद - गीता प्रेस            

सुभाषितम्

    पुष्पे गन्धं तिले तैलं काष्ठेऽग्निं पयसि घृतम्।
    इक्षौ गुडं तथा देहे पश्याऽत्मानं विवेकत: ॥

     अर्थात् जैसे पुष्प मे गन्ध, तिल मे तैल, काष्ठ मे अग्नि, दूध मे घी और ईख मे गुड होता है वैसे शरीर मे परमात्मा विद्यमान है, विवेक द्वारा आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार करना चाहिये ।

    पात्रे त्यागी गुणे रागी संविभागी च बन्धुषु।
    शास्त्रे बोद्धा रणे योद्धा स वै पुरुष पञ्चलक्षणः उच्चते।।

    अर्थात् जो उचित पात्र के लिए त्याग करता है, दूसरों के गुणों को स्वीकार करता है, अपने सुख-दुःख को बन्धु-बान्धव के साथ बाँटता है, शास्त्रों से ज्ञान ग्रहण करता है, युद्ध में वीरता का प्रदर्शन करता है, उसे ही सच्चे अर्थ में पुरुष कहा जाता है।

    विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
    यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्।।

    अर्थात् विपत्तिकाल में धैर्य धारण करना और समृद्धिकाल में क्षमाशीलता, सभा में वचन नैपुण्य, युद्धभूमि में शौर्य, यश प्राप्ति में विशेष रूचि और वेदाध्ययन कार्य में विशेष आसक्ति निश्चयपूर्वक ये उपर्युक्त सभी बातें महापुरुषों में स्वभाव से ही सिद्ध होती हैं।

    सौजन्य से - श्री कुलदीप पुरोहित (गुजरात)

    नैवाकृतिः फलति नैव कुलं न शीलं,

    विद्यापि नैव न च यत्नकृतापि सेवा।

    भाग्यानि पूर्वतपसा किल सञ्चितानि,

    काले फलन्ति पुरुषस्य यथैव वृक्षाः।।

    अन्वयः -

    आकृतिः न फलति एव । कुलं न (फलति) एव । शीलं न (फलति एव) । विद्या अपि न (फलति) एव । यत्नकृता सेवा अपि च न (फलति एव) । यथा वृक्षाः काले फलन्ति (तथा एव) पुरुषस्य पूर्वतपसा सञ्चितानि भाग्यानि (काले फलन्ति)।

     भावानुवादः -

    --आकृतिः,कुलं,शीलं,विद्या वा यत्नकृता सेवा-  सर्वाणि एतानि न फलीभूतानि भवन्ति। किन्तु यथा वृक्षः योग्यकाले  फलानि ददाति तथैव पूर्वतपसा सञ्चितानि  कर्माणि योग्यकाले एव पुरुषाय फलं ददाति।

    हिन्दी अनुवादः -

    --आकृति, कुल, चारित्र, विद्या या यत्नपूर्वक की गई सेवा- इनमें से कुछ भी तत्काल फलीभूत होता नही है ; लेकिन जैसे वृक्ष समय आने पर ही फल देते है, वैसे ही पूर्व में किए गए तप से सञ्चित हुए कर्म समय पर मनुष्य को फल देते है।

    पुष्पे गन्धं तिले तैलं काष्ठेऽग्निं पयसि घृतम्।
    इक्षौ गुडं तथा देहे पश्याऽत्मानं विवेकत: ॥

     अर्थात् जैसे पुष्प मे गन्ध, तिल मे तैल, काष्ठ मे अग्नि, दूध मे घी और ईख मे गुड होता है वैसे शरीर मे परमात्मा विद्यमान है, विवेक द्वारा आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार करना चाहिये ।

    पात्रे त्यागी गुणे रागी संविभागी च बन्धुषु।
    शास्त्रे बोद्धा रणे योद्धा स वै पुरुष पञ्चलक्षणः उच्चते।।

    अर्थात् जो उचित पात्र के लिए त्याग करता है, दूसरों के गुणों को स्वीकार करता है, अपने सुख-दुःख को बन्धु-बान्धव के साथ बाँटता है, शास्त्रों से ज्ञान ग्रहण करता है, युद्ध में वीरता का प्रदर्शन करता है, उसे ही सच्चे अर्थ में पुरुष कहा जाता है।

    विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
    यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्।।

    अर्थात् विपत्तिकाल में धैर्य धारण करना और समृद्धिकाल में क्षमाशीलता, सभा में वचन नैपुण्य, युद्धभूमि में शौर्य, यश प्राप्ति में विशेष रूचि और वेदाध्ययन कार्य में विशेष आसक्ति निश्चयपूर्वक ये उपर्युक्त सभी बातें महापुरुषों में स्वभाव से ही सिद्ध होती हैं।

    सौजन्य से - श्री कुलदीप पुरोहित (गुजरात)

    नैवाकृतिः फलति नैव कुलं न शीलं,

    विद्यापि नैव न च यत्नकृतापि सेवा।

    भाग्यानि पूर्वतपसा किल सञ्चितानि,

    काले फलन्ति पुरुषस्य यथैव वृक्षाः।।

    अन्वयः -

    आकृतिः न फलति एव । कुलं न (फलति) एव । शीलं न (फलति एव) । विद्या अपि न (फलति) एव । यत्नकृता सेवा अपि च न (फलति एव) । यथा वृक्षाः काले फलन्ति (तथा एव) पुरुषस्य पूर्वतपसा सञ्चितानि भाग्यानि (काले फलन्ति)।

     भावानुवादः -

    --आकृतिः,कुलं,शीलं,विद्या वा यत्नकृता सेवा-  सर्वाणि एतानि न फलीभूतानि भवन्ति। किन्तु यथा वृक्षः योग्यकाले  फलानि ददाति तथैव पूर्वतपसा सञ्चितानि  कर्माणि योग्यकाले एव पुरुषाय फलं ददाति।

    हिन्दी अनुवादः -

    --आकृति, कुल, चारित्र, विद्या या यत्नपूर्वक की गई सेवा- इनमें से कुछ भी तत्काल फलीभूत होता नही है ; लेकिन जैसे वृक्ष समय आने पर ही फल देते है, वैसे ही पूर्व में किए गए तप से सञ्चित हुए कर्म समय पर मनुष्य को फल देते है।

यज्ञोपवीत: एक परिचय

  • सुनीत कुमार

यज्ञोपवीत : परिचय एवं विज्ञान

आपने देखा होगा कि बहुत से लोग बायें कन्धे से दायीं भुजा की ओर एक कच्चा धागा लपेटे रहते हैं। इस धागे को 'यज्ञोपवीत' कहते हैं। यज्ञोपवीत तीन धागों वाला एक सूत्र होता है। इसे गले में इस तरह डाला जाता है कि वह बायें  कन्धे के ऊपर रहे।

तीन सूत्र क्यों : जनेऊ में मुख्‍यरूप से तीन धागे होते हैं। यह तीन सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक होते हैं| इन्हें सत्व, रजस् और तमस् , गायत्री मन्त्र के तीन चरणों और तीन आश्रमों का प्रतीक भी कहा जाता है। संन्यास आश्रम में यज्ञोपवीत को उतार दिया जाता है।

नौ तार : यज्ञोपवीत के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। इस तरह कुल तारों की संख्‍या नौ होती है। एक मुख, दो नासिका, दो अक्ष , दो कर्ण , मल और मूत्र के दो द्वार मिलकर कुल नौ की संख्या है|

गाँठ: यज्ञोपवीत में पाँच गाँठें लगाई जाती हैं जो ब्रह्म, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्रतीक हैं| ये पञ्च यज्ञों, पञ्च ज्ञानेद्रियों और पञ्चकर्मों की भी प्रतीक हैं।

वैदिक धर्म में यज्ञोपवीत पहनना और उसके नियमों का पालन करना प्रत्येक आर्य का कर्तव्य है। प्रत्येक आर्य (हिन्दू) जनेऊ पहन सकता है बशर्ते कि वह उसके नियमों का पालन करे।

ब्राह्मण ही नहीं समाज का प्रत्येक वर्ग यज्ञोपवीत धारण कर सकता है। यज्ञोपवीत धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। द्विज का अर्थ होता है दूसरा जन्म। लड़कियों को भी जनेऊ धारण करने का अधिकार है ।

यज्ञोपवीत की माप: यज्ञोपवीत की लंबाई 96 अंगुल होती है। इसका अभिप्राय यह है कि यज्ञोपवीत धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए। चार वेद, चार उपवेद, षड् वेदाङ्ग, छह  दर्शन, तीन सूत्र ग्रन्थ, नौ आरण्यक मिलाकर कुल 32 विद्याएं होती हैं। 64 कलाओं में जैसे- वास्तु, व्यञ्जन, कला, चित्रकारी, साहित्य, दस्तकारी, भाषा, यन्त्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी,  आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि सम्मिलित हैं ।

यज्ञोपवीत के नियम :

1. यज्ञोपवीत को मल-मूत्र विसर्जन से पूर्व दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका प्रयोजन यह है कि यज्ञोपवीत कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। अपनी व्रतशीलता के संकल्प का ध्यान इसी बहाने बार-बार किया जाता है।

2. यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए अथवा 6 माह से अधिक का समय हो जाये तो बदल देना चाहिए। खण्डित यज्ञोपवीत शरीर पर नहीं रखते हैं । धागे कच्चे और गन्दे होने लगें, तो बदल देना ही उचित होता है।

3. जन्म-मरण के सूतक के बाद इसे बदल देने की परम्परा है।

4. यज्ञोपवीत शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित करें।

5. मर्यादा बनाये रखने के लिए उसमें चाबी के गुच्छे आदि नहीं लटकाये जाने चाहिए। बालक जब इन नियमों के पालन करने के योग्य हो जायें, तभी उनका यज्ञोपवीत संस्कार करना चाहिए।

यज्ञोपवीत धारण करने के लाभ:

* चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दायें कान की नस अण्डकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दायें कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है।

* वैज्ञानिकों अनुसार बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से इस समस्या से मुक्ति मिल जाती है।

* कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जागरण होता है।

* कान पर जनेऊ लपेटने से पेट सम्बन्धी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है।

* माना जाता है कि शरीर के पृष्ठभाग में पीठ से होकर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह काम करती है। यह रेखा दायें कन्धे से लेकर कमर तक स्थित है। इस रेखा पर यज्ञोपवीत धारण करने से विद्युत प्रवाह नियंत्रित रहता है, जिससे काम-क्रोध पर नियन्त्रण रखने में आसानी होती है।

* यज्ञोपवीत धारण करने से पवित्रता की अनुभूति होती है। पवित्रता मन को बुरे कार्यों से बचाती है।

यज्ञोपवीत: एक परिचय

  • सुनीत कुमार

यज्ञोपवीत : परिचय एवं विज्ञान

आपने देखा होगा कि बहुत से लोग बायें कन्धे से दायीं भुजा की ओर एक कच्चा धागा लपेटे रहते हैं। इस धागे को 'यज्ञोपवीत' कहते हैं। यज्ञोपवीत तीन धागों वाला एक सूत्र होता है। इसे गले में इस तरह डाला जाता है कि वह बायें  कन्धे के ऊपर रहे।

तीन सूत्र क्यों : जनेऊ में मुख्‍यरूप से तीन धागे होते हैं। यह तीन सूत्र देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण के प्रतीक होते हैं| इन्हें सत्व, रजस् और तमस् , गायत्री मन्त्र के तीन चरणों और तीन आश्रमों का प्रतीक भी कहा जाता है। संन्यास आश्रम में यज्ञोपवीत को उतार दिया जाता है।

नौ तार : यज्ञोपवीत के एक-एक तार में तीन-तीन तार होते हैं। इस तरह कुल तारों की संख्‍या नौ होती है। एक मुख, दो नासिका, दो अक्ष , दो कर्ण , मल और मूत्र के दो द्वार मिलकर कुल नौ की संख्या है|

गाँठ: यज्ञोपवीत में पाँच गाँठें लगाई जाती हैं जो ब्रह्म, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्रतीक हैं| ये पञ्च यज्ञों, पञ्च ज्ञानेद्रियों और पञ्चकर्मों की भी प्रतीक हैं।

वैदिक धर्म में यज्ञोपवीत पहनना और उसके नियमों का पालन करना प्रत्येक आर्य का कर्तव्य है। प्रत्येक आर्य (हिन्दू) जनेऊ पहन सकता है बशर्ते कि वह उसके नियमों का पालन करे।

ब्राह्मण ही नहीं समाज का प्रत्येक वर्ग यज्ञोपवीत धारण कर सकता है। यज्ञोपवीत धारण करने के बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। द्विज का अर्थ होता है दूसरा जन्म। लड़कियों को भी जनेऊ धारण करने का अधिकार है ।

यज्ञोपवीत की माप: यज्ञोपवीत की लंबाई 96 अंगुल होती है। इसका अभिप्राय यह है कि यज्ञोपवीत धारण करने वाले को 64 कलाओं और 32 विद्याओं को सीखने का प्रयास करना चाहिए। चार वेद, चार उपवेद, षड् वेदाङ्ग, छह  दर्शन, तीन सूत्र ग्रन्थ, नौ आरण्यक मिलाकर कुल 32 विद्याएं होती हैं। 64 कलाओं में जैसे- वास्तु, व्यञ्जन, कला, चित्रकारी, साहित्य, दस्तकारी, भाषा, यन्त्र निर्माण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, दस्तकारी,  आभूषण निर्माण, कृषि ज्ञान आदि सम्मिलित हैं ।

यज्ञोपवीत के नियम :

1. यज्ञोपवीत को मल-मूत्र विसर्जन से पूर्व दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए। इसका प्रयोजन यह है कि यज्ञोपवीत कमर से ऊंचा हो जाए और अपवित्र न हो। अपनी व्रतशीलता के संकल्प का ध्यान इसी बहाने बार-बार किया जाता है।

2. यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए अथवा 6 माह से अधिक का समय हो जाये तो बदल देना चाहिए। खण्डित यज्ञोपवीत शरीर पर नहीं रखते हैं । धागे कच्चे और गन्दे होने लगें, तो बदल देना ही उचित होता है।

3. जन्म-मरण के सूतक के बाद इसे बदल देने की परम्परा है।

4. यज्ञोपवीत शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता। साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं। भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित करें।

5. मर्यादा बनाये रखने के लिए उसमें चाबी के गुच्छे आदि नहीं लटकाये जाने चाहिए। बालक जब इन नियमों के पालन करने के योग्य हो जायें, तभी उनका यज्ञोपवीत संस्कार करना चाहिए।

यज्ञोपवीत धारण करने के लाभ:

* चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दायें कान की नस अण्डकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ी होती है। मूत्र विसर्जन के समय दायें कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्राणुओं की रक्षा होती है।

* वैज्ञानिकों अनुसार बार-बार बुरे स्वप्न आने की स्थिति में जनेऊ धारण करने से इस समस्या से मुक्ति मिल जाती है।

* कान में जनेऊ लपेटने से मनुष्य में सूर्य नाड़ी का जागरण होता है।

* कान पर जनेऊ लपेटने से पेट सम्बन्धी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है।

* माना जाता है कि शरीर के पृष्ठभाग में पीठ से होकर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह काम करती है। यह रेखा दायें कन्धे से लेकर कमर तक स्थित है। इस रेखा पर यज्ञोपवीत धारण करने से विद्युत प्रवाह नियंत्रित रहता है, जिससे काम-क्रोध पर नियन्त्रण रखने में आसानी होती है।

* यज्ञोपवीत धारण करने से पवित्रता की अनुभूति होती है। पवित्रता मन को बुरे कार्यों से बचाती है।

टिप्पणियाँ :
  • shivangi sharma

    bahut sundar

  • shivangi sharma

    bahut sundar

  • Prof. Harihara Hota

    शिक्षणीयं तत्त्वम्

  • Prof. Harihara Hota

    शिक्षणीयं तत्त्वम्

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