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वेदवाणी

    यजुर्वेद में ग्रहों से सम्बन्धित ऋचाएं - क्रमशः -1 

    सूर्य- ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् (यजु. 33। 43, 34। 31) 

    चन्द्र- ॐ इमं देवा असपत्नं सुवध्यं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठ्याय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय। इमममुष्य पुत्रममुष्ये पुत्रमस्यै विश एष वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा।।
    (यजु. 10। 18)

    भौम- ॐ अग्निमूर्धा दिव: ककुत्पति: पृथिव्या अयम्। अपां रेतां सि जिन्वति।। (यजु. 3।12) 

    बुध- ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते सं सृजेधामयं च। अस्मिन्त्सधस्‍थे अध्‍युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यशमानश्च सीदत।। (यजु. 15।54) 

     गुरु- ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु। यद्दीदयच्छवस ऋतुप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्।। (यजु. 26।3)

    शुक्र- ॐ अन्नात्परिस्त्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपित्क्षत्रं पय: सोमं प्रजापति:। ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु।। (यजु. 19।75) 

    शनि- ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्त्रवन्तु न:।। (यजु. 36।12) 

    राहु- ॐ कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृध: सखा। कया शचिष्ठया वृता।। (यजु. 36।4)

    केतु- ॐ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे। समुषद्भिरजायथा:।। (यजु. 29।37)

    यजुर्वेद में ग्रहों से सम्बन्धित ऋचाएं - क्रमशः -1 

    सूर्य- ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन् (यजु. 33। 43, 34। 31) 

    चन्द्र- ॐ इमं देवा असपत्नं सुवध्यं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठ्याय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय। इमममुष्य पुत्रममुष्ये पुत्रमस्यै विश एष वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा।।
    (यजु. 10। 18)

    भौम- ॐ अग्निमूर्धा दिव: ककुत्पति: पृथिव्या अयम्। अपां रेतां सि जिन्वति।। (यजु. 3।12) 

    बुध- ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते सं सृजेधामयं च। अस्मिन्त्सधस्‍थे अध्‍युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यशमानश्च सीदत।। (यजु. 15।54) 

     गुरु- ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु। यद्दीदयच्छवस ऋतुप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्।। (यजु. 26।3)

    शुक्र- ॐ अन्नात्परिस्त्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपित्क्षत्रं पय: सोमं प्रजापति:। ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु।। (यजु. 19।75) 

    शनि- ॐ शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्त्रवन्तु न:।। (यजु. 36।12) 

    राहु- ॐ कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृध: सखा। कया शचिष्ठया वृता।। (यजु. 36।4)

    केतु- ॐ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेशसे। समुषद्भिरजायथा:।। (यजु. 29।37)

उपनिषद् - धारा

    ईशावास्योपनिषद् (मन्त्र-अनुवाद )-----1 (क्रमशः)

    (ईशावास्योपनिषद् शुक्लयजुर्वेदकाण्वसंहिता का ४०वां अध्याय है.  )

    ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते I

    पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते I I 1 I I

    ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

    = सच्चिदानन्दघन, अदः = वह परब्रह्म, पूर्णम् = सब प्रकार से पूर्ण हैं, इदम् = यह जगत् भी, पूर्णम् = पूर्ण (ही) है, (क्योंकि) पूर्णात् = पूर्ण से (परब्रह्म) से ही, पूर्णम् = यह पूर्ण, उदच्यते = उत्पन्न हुआ है, पूर्णस्य = पूर्ण के (से), पूर्णम् = पूर्ण को, आदाय = निकाल लेने पर (भी), पूर्णम् = पूर्ण, एव = ही, अवशिष्यते = बचता है.

    अर्थात् सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमेश्वर पुरुषोत्तम सब प्रकार से सदा-सर्वदा परिपूर्ण है. यह जगत् भी उस परब्रह्म से परिपूर्ण है क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है. इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत् पूर्ण है. इसलिए भी वह परिपूर्ण है. उस पूर्ण ब्रह्म से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही बच रहता है.

    त्रिविध ताप की शान्ति हो. ( ताप या दुःख तीन प्रकार के होते है - आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक )

    साभार - ईशादि नौ उपनिषद - गीता प्रेस            

    ईशावास्योपनिषद् (मन्त्र-अनुवाद )-----1 (क्रमशः)

    (ईशावास्योपनिषद् शुक्लयजुर्वेदकाण्वसंहिता का ४०वां अध्याय है.  )

    ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते I

    पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते I I 1 I I

    ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः

    = सच्चिदानन्दघन, अदः = वह परब्रह्म, पूर्णम् = सब प्रकार से पूर्ण हैं, इदम् = यह जगत् भी, पूर्णम् = पूर्ण (ही) है, (क्योंकि) पूर्णात् = पूर्ण से (परब्रह्म) से ही, पूर्णम् = यह पूर्ण, उदच्यते = उत्पन्न हुआ है, पूर्णस्य = पूर्ण के (से), पूर्णम् = पूर्ण को, आदाय = निकाल लेने पर (भी), पूर्णम् = पूर्ण, एव = ही, अवशिष्यते = बचता है.

    अर्थात् सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमेश्वर पुरुषोत्तम सब प्रकार से सदा-सर्वदा परिपूर्ण है. यह जगत् भी उस परब्रह्म से परिपूर्ण है क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है. इस प्रकार परब्रह्म की पूर्णता से जगत् पूर्ण है. इसलिए भी वह परिपूर्ण है. उस पूर्ण ब्रह्म से पूर्ण को निकाल देने पर भी वह पूर्ण ही बच रहता है.

    त्रिविध ताप की शान्ति हो. ( ताप या दुःख तीन प्रकार के होते है - आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक )

    साभार - ईशादि नौ उपनिषद - गीता प्रेस            

सुभाषितम्

    पुष्पे गन्धं तिले तैलं काष्ठेऽग्निं पयसि घृतम्।
    इक्षौ गुडं तथा देहे पश्याऽत्मानं विवेकत: ॥

     अर्थात् जैसे पुष्प मे गन्ध, तिल मे तैल, काष्ठ मे अग्नि, दूध मे घी और ईख मे गुड होता है वैसे शरीर मे परमात्मा विद्यमान है, विवेक द्वारा आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार करना चाहिये ।

    पात्रे त्यागी गुणे रागी संविभागी च बन्धुषु।
    शास्त्रे बोद्धा रणे योद्धा स वै पुरुष पञ्चलक्षणः उच्चते।।

    अर्थात् जो उचित पात्र के लिए त्याग करता है, दूसरों के गुणों को स्वीकार करता है, अपने सुख-दुःख को बन्धु-बान्धव के साथ बाँटता है, शास्त्रों से ज्ञान ग्रहण करता है, युद्ध में वीरता का प्रदर्शन करता है, उसे ही सच्चे अर्थ में पुरुष कहा जाता है।

    विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
    यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्।।

    अर्थात् विपत्तिकाल में धैर्य धारण करना और समृद्धिकाल में क्षमाशीलता, सभा में वचन नैपुण्य, युद्धभूमि में शौर्य, यश प्राप्ति में विशेष रूचि और वेदाध्ययन कार्य में विशेष आसक्ति निश्चयपूर्वक ये उपर्युक्त सभी बातें महापुरुषों में स्वभाव से ही सिद्ध होती हैं।

    सौजन्य से - श्री कुलदीप पुरोहित (गुजरात)

    नैवाकृतिः फलति नैव कुलं न शीलं,

    विद्यापि नैव न च यत्नकृतापि सेवा।

    भाग्यानि पूर्वतपसा किल सञ्चितानि,

    काले फलन्ति पुरुषस्य यथैव वृक्षाः।।

    अन्वयः -

    आकृतिः न फलति एव । कुलं न (फलति) एव । शीलं न (फलति एव) । विद्या अपि न (फलति) एव । यत्नकृता सेवा अपि च न (फलति एव) । यथा वृक्षाः काले फलन्ति (तथा एव) पुरुषस्य पूर्वतपसा सञ्चितानि भाग्यानि (काले फलन्ति)।

     भावानुवादः -

    --आकृतिः,कुलं,शीलं,विद्या वा यत्नकृता सेवा-  सर्वाणि एतानि न फलीभूतानि भवन्ति। किन्तु यथा वृक्षः योग्यकाले  फलानि ददाति तथैव पूर्वतपसा सञ्चितानि  कर्माणि योग्यकाले एव पुरुषाय फलं ददाति।

    हिन्दी अनुवादः -

    --आकृति, कुल, चारित्र, विद्या या यत्नपूर्वक की गई सेवा- इनमें से कुछ भी तत्काल फलीभूत होता नही है ; लेकिन जैसे वृक्ष समय आने पर ही फल देते है, वैसे ही पूर्व में किए गए तप से सञ्चित हुए कर्म समय पर मनुष्य को फल देते है।

    पुष्पे गन्धं तिले तैलं काष्ठेऽग्निं पयसि घृतम्।
    इक्षौ गुडं तथा देहे पश्याऽत्मानं विवेकत: ॥

     अर्थात् जैसे पुष्प मे गन्ध, तिल मे तैल, काष्ठ मे अग्नि, दूध मे घी और ईख मे गुड होता है वैसे शरीर मे परमात्मा विद्यमान है, विवेक द्वारा आत्मा परमात्मा का साक्षात्कार करना चाहिये ।

    पात्रे त्यागी गुणे रागी संविभागी च बन्धुषु।
    शास्त्रे बोद्धा रणे योद्धा स वै पुरुष पञ्चलक्षणः उच्चते।।

    अर्थात् जो उचित पात्र के लिए त्याग करता है, दूसरों के गुणों को स्वीकार करता है, अपने सुख-दुःख को बन्धु-बान्धव के साथ बाँटता है, शास्त्रों से ज्ञान ग्रहण करता है, युद्ध में वीरता का प्रदर्शन करता है, उसे ही सच्चे अर्थ में पुरुष कहा जाता है।

    विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
    यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्।।

    अर्थात् विपत्तिकाल में धैर्य धारण करना और समृद्धिकाल में क्षमाशीलता, सभा में वचन नैपुण्य, युद्धभूमि में शौर्य, यश प्राप्ति में विशेष रूचि और वेदाध्ययन कार्य में विशेष आसक्ति निश्चयपूर्वक ये उपर्युक्त सभी बातें महापुरुषों में स्वभाव से ही सिद्ध होती हैं।

    सौजन्य से - श्री कुलदीप पुरोहित (गुजरात)

    नैवाकृतिः फलति नैव कुलं न शीलं,

    विद्यापि नैव न च यत्नकृतापि सेवा।

    भाग्यानि पूर्वतपसा किल सञ्चितानि,

    काले फलन्ति पुरुषस्य यथैव वृक्षाः।।

    अन्वयः -

    आकृतिः न फलति एव । कुलं न (फलति) एव । शीलं न (फलति एव) । विद्या अपि न (फलति) एव । यत्नकृता सेवा अपि च न (फलति एव) । यथा वृक्षाः काले फलन्ति (तथा एव) पुरुषस्य पूर्वतपसा सञ्चितानि भाग्यानि (काले फलन्ति)।

     भावानुवादः -

    --आकृतिः,कुलं,शीलं,विद्या वा यत्नकृता सेवा-  सर्वाणि एतानि न फलीभूतानि भवन्ति। किन्तु यथा वृक्षः योग्यकाले  फलानि ददाति तथैव पूर्वतपसा सञ्चितानि  कर्माणि योग्यकाले एव पुरुषाय फलं ददाति।

    हिन्दी अनुवादः -

    --आकृति, कुल, चारित्र, विद्या या यत्नपूर्वक की गई सेवा- इनमें से कुछ भी तत्काल फलीभूत होता नही है ; लेकिन जैसे वृक्ष समय आने पर ही फल देते है, वैसे ही पूर्व में किए गए तप से सञ्चित हुए कर्म समय पर मनुष्य को फल देते है।

ओज - प्रक्रिया एवं महत्त्व

  • साभार - आचार्य विदुर पाण्डेय

!! श्री गुरुभ्यो नमः !!

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: वीर्य कैसे बनता है ? :
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विर्य शरीर की बहुत मूल्यवान धातु है । भोजन से वीर्य बनने की प्रक्रिया बड़ी लम्बी है । आचार्यपाद् सुश्रुत ने अनुग्रह करते लिखा है :

रसाद्रक्तं ततो मांसं मांसान्मेदः प्रजायते ।
मेदस्यास्थिः ततो मज्जायाः शुक्र संभवः ॥

नाराय ! जो भोजन पचता है , उसका पहले रस बनता है । पाँच दिवस तक उसका पाचन होकर रक्त बनता है । पाँच दिवस बाद रक्त से मांस , उसमें से 5 - 5 दिन के अन्तर से मेद , मेद से हड्डी , हड्डी से मज्जा और मज्जा से अन्त में वीर्य वनता है । स्त्री में जो यह धातु बनती है उसे " रज " कहते हैं । इस प्रकार वीर्य बनने में करीब 30 दिन व 4 धण्टे लग जाते हैं । वैज्ञानिक बताते हैं कि 32 किलो भोजन से 800 ग्राम रक्त बनता है और 800 ग्राम से लगभग 20 ग्राम वीर्य बनता है । एक स्वस्थ्य मनुष्य एक दिन में 800 ग्राम भोजन के हिसाब से 40 दिन में 32 किलो भोजन करे तो उसकी कमाई लगभग 20 ग्राम वीर्य होगी । महीने की करीब 15 ग्राम हुई और 15 ग्राम या इससे कुछ अधिक वीर्य एक बार के मैथुन में खर्च होता है ।

नारायण ! एक माली था । उसने अपना तन - मन लगाकर कई दिनों तक परिश्रम करके एक सुन्दर बगीचा तैयार किया , जिससे भाँति - भाँति के मधुर सुगन्धयुक्त पुष्प खिले । उन पुष्पों से उसने अर्थात् माली ने बढ़िया इत्र तैयार किया । फिर उसने क्या किया , जानते हैं ? उस इत्र को एक गंदी नाली में बहा दिया । अरे ! इतने दिनों के परिश्रम से तैयार किये गये इत्र को , जिसकी सुगन्ध से उसका घर महकनेवाला था , उसने "मोरी" में अर्थात् नाली में बहा दिया ! आप कहेंगे कि " वह माली बड़ा मूर्ख था , पगला था .... " मगर आप अपने - आपमें ही झाँककर देखे , वह माली कहीं और ढूँढ़ने की जरूरत नहीं है , हममें से कई लोग ऐसे ही माली हैं । विचार करेंगे आपका भला होगा ।

नारायण ! वीर्य बचपन से लेकर आज तक , यानी 15 - 20 वर्षों में तैयार होकर ओजरूप में शरीर में विद्यमान रहकर तेज , बल और स्फूर्ति देता रहा । अभी भी जो करीब 30 दिन के परिश्रम की कमाई थी , उसे यों ही सामान्य आवेग में आकर अविवेकपूर्वक खर्च कर देना कहाँ की बुद्धिमानी है ? क्या यह उस माली जैसा ही कर्म नहीं है ? वह माली तो दो- चार बार यह भूल करने के बाद किसीके समझाने पर संभल भी गया होगा , फिर वही- की - वही भूल नहीं दोहरायी होगी परन्तु आज तो कई लोग वही भूल दोहराते रहते हैं । अन्त में पश्चाताप ही हाथ लगता है । अमृत रस को बहा कर । क्षणिक सुख के लिए व्यक्ति कामांध होकर बड़े उत्साह से इस मैथुनरूपी कृत्य में पड़ता है परन्तु कृत्य पूरा होते ही वह मुर्दे जैसा हो जाता है । होगा ही , उसे पता ही नहीं कि सुख तो नहीं मिला केवल सुखाभास हुआ परन्तु उसमें उसने 30 - 40 दिन की कमाई खो दी ।

नारायण ! युवावस्था आने तक वीर्यसंचय होता है । वह शरीर में ओज के रूप में अर्थात् जीवनीशक्ति के रूप में स्थित रहता है । वह तो वीर्यक्षय से नष्ट होता ही है , अति मैथुन से तो हड्डियों में से भी कुछ सफेद अंश निकलने लगता है , जिससे युवक कमज़ोर होकर नपुंसक भी बन जाते हैं । फिर वे किसीके सम्मुख आँख उठाकर भी नहीं देख पाते । उनका जीवन नारकीय बन जाता है । विचार करना वीर्य निकलने में सुखाभास होता है तो संचय में कितना आनन्द मिलेगा । अपने तेज का रक्षण करिये । परमात्मा इस कार्य में आपकी सहायता करें ।

मरणं बिन्दु - पातेन जीवनं बिन्दु - धारणात् ।

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