संस्कृत का प्रचार

संस्कृत भाषा विश्व की प्राचीनतमा, सबसे समृद्ध और वैज्ञानिक भाषा है. इसके साहित्य में शरीर, मन, बुद्धि, लोक–परलोक और आत्मा के संस्कार पर गहन और सटीक विचार–विमर्श किया गया है. वैयक्तिक जीवनचर्या, सह-अस्तित्व, मानव-प्रकृति सम्बन्ध, प्राणिमात्र का कल्याण, राष्ट्र की वृद्धि-समृद्धि, सभी के प्रति समन्वय और प्रेम की जो दृष्टि संस्कृत के साहित्य में प्रदर्शित की गई है, उसका विश्व में कोई विकल्प नहीं है. यही कारण है कि आर्यावर्त सहस्रों वर्ष तक विश्वगुरु की प्रतिष्ठा को प्राप्त कर सुशोभित होता रहा. आज संसार में जहाँ एक ओर तकनीक और विज्ञान के नित्य नये मानदण्ड स्थापित होते जा रहे हैं, वहीँ दूसरी ओर व्यक्ति से लेकर राष्ट्रों तक आपसी खींचतान, रहन-सहन के अविवेकपूर्ण तरीके, प्रकृति और मानव के बीच असन्तुलित सम्बन्ध, वर्चस्व स्थापित करने की अन्तहीन जंग आदि क्रियाकलाप मानव सृजित विकराल समस्या के रूप में हमारे सामने उपस्थित होकर सम्पूर्ण मानवता को संकट में डालते जा रहे हैं. संसाधनों पर ताकतवर का कब्ज़ा, गरीबी, भुखमरी, आतंकवाद आदि सब समाज की तथाकथित आधुनिक और मनोवैज्ञानिक शिक्षा व्यवस्था और विकास की अवधारणा की विद्रूपता के ही परिणाम हैं.

वैदिककालीन ऋषियों और चिन्तकों को इस अव्यवस्था का अनुमान था, इसलिए उन्होंने समाज को जो विचार दृष्टि और जीवन दर्शन दिया वह त्याग, सर्वकल्याण और सर्वोत्थान की भावना से ओतप्रोत था. समाज में अधिकारों के साथ कर्त्तव्य की भी शिक्षा दी जाती थी. दण्डव्यवस्था से जयादा आत्मप्रेरणा अनुशासन का महत्त्वपूर्ण कारक थी. संस्कृत जिसका अर्थ ही ‘परिष्कृत’ है मात्र भाषा न होकर शुचिता और पवित्रता की संवाहक थी. विचारों की पवित्रता, साधन की पवित्रता और आचरण की पवित्रता से जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पवित्रता बनी रहती थी. इसी पवित्रता में व्यक्ति कल्याण से लेकर विश्वकल्याण तक निहित था. समय के साथ इन शिक्षाओं और जीवन मूल्यों को जीवनचर्या से बाहर कर दिया गया, जिसका परिणाम आज किसी से छिपा नहीं है. आज विश्व के सामने जितनी समस्याएं विकराल रूप में उपस्थित हैं, उनमें से अधिकांश मानवसृजित हैं. इन सभी समस्यायों का एक मात्र समाधान संस्कृत भाषा के साहित्य और उसमें निहित जीवन मूल्यों में है. हमें गर्व है कि यह संस्कृत साहित्य हमारी विरासत है और हमारी जिम्मेदारी है कि हम इसके माध्यम से व्यक्ति से लेकर विश्व का कल्याण करे. अकादमी इस महत् कार्य में सक्रिय सहयोग और भागीदारी के लिए आपका आह्वान करती है.

संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए अकादमी की विशिष्ट गतिविधियाँ निम्नवत् हैं –

• माध्यमिक विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों के बीच संस्कृत में निहित जीवन मूल्यों की चर्चा कर उन्हें इसके अध्ययन से मिलने वाले रोजगार की जानकारी देकर संस्कृत विषय का अध्ययन करने के लिए प्रेरित करना.
• माध्यमिक विद्यालयों में अध्यापन करने वाले अध्यापकों को प्रशिक्षण देकर उन्हें संस्कृत के प्रचार-प्रसार और संवर्धन की दिशा में प्रवृत्त करना.
• संस्कृत भाषा और उसके साहित्य की ओर उन्मुख होने के लिए आमजन के बीच नुक्कड़ नाटक/संवाद/कार्यशाला आदि जागरूकता कार्यक्रम करना.
• तकनीक और सञ्चार माध्यमों का अधिकाधिक प्रयोगकर संस्कृत से सम्बन्धित सूचना अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाना.
• संस्कृत के जनोपयोगी साहित्य का सरल भाषा में अनुवाद कर, उसका आम लोगों के बीच वितरित करना.
• छात्रों सहित आमजन को मूल्यपरक शिक्षा के माध्यम से आदर्श जीवनचर्या के ओर उन्मुख करना.

संस्कृत के प्रचार -प्रसार एवं संवर्धन कार्यक्रम से जुड़ने एवं सहयोग करने के लिए यह पर क्लिक करें.