पारम्परिक संस्कृत शिक्षण

संस्कृत भाषा का प्रायः दो स्तरों पर प्रयोग हो रहा है. एक संस्कृत विषय के रूप में, जिसका अध्ययन-अध्यापन आधुनिक विद्यालयों और महाविद्यालयों में होता है तथा द्वितीय पारम्परिक संस्कृत, जिसका प्रयोग कर्मकाण्ड एवं उपासना आदि में किया जाता है. जो व्यक्ति संस्कृत के औपचारिक अध्येता नहीं रहे हैं, व्यापक स्तर पर वे भी इसका प्रयोग करते हैं. दैनिक पूजापाठ-उपासना कर्म में प्रयुक्त मन्त्र, हवन एवं शास्त्रों (भगवद्गीता, दुर्गाशप्तशती, रामायण,स्तोत्र आदि) का नियमित पाठ इसी पारम्परिक संस्कृत के प्रयोग के अन्तर्गत आता है.

प्रायः यह देखा जाता है कि इस कार्य के लिए अधिकांश लोग पुरोहित के आश्रित रहते है अथवा यदि वे स्वयं इनका विधान करते हैं, तो प्रक्रियागत एवं उच्चारणगत दोष होने की सम्भावना रहती है. यज्ञ-उपासना आदि कर्म में प्रक्रिया एवं उच्चारण की शुद्धता का विशेष महत्व है. इसमें असावधानी से अर्थ का अनर्थ होने की सम्भावना रहती है. इसलिए पारम्परिक संस्कृत के प्रयोग में दक्षता का होना आवश्यक है.

अकादमी आमजन को यज्ञ-उपासना तथा दैनिक कर्मकाण्ड में संस्कृत भाषा के प्रयोग का प्रशिक्षण देने का कार्य करती है, जिससे कोई भी व्यक्ति पूर्ण शुद्धता के साथ इन कार्यों को स्वयं सम्पन्न कर सके और वातावरण में शुद्ध और पवित्र ध्वनिओं की अनुगूंज विद्यमान रहे. अकादमी के दिल्ली स्थित मुख्य परिसर, अन्य शिक्षण केन्द्रों एवं वेबसाईट ( ई-लर्निंग पोर्टल) के द्वारा इस प्रशिक्षण योजना में पञ्जीकरण कराया जा इसके पीछे सकता है. प्रशिक्षण का यह कार्य पूरे वर्ष सञ्चालित होता है, जिसमें किसी भी आयुवर्ग का कोई भी व्यक्ति प्रवेश पा सकता है.

पारम्परिक संस्कृत प्रशिक्षण प्राप्त करने हेतु पञ्जीकरण कराने के लिए यहाँ पर क्लिक करें