परिसंवाद

स्वामी रामतीर्थ संस्कृत अकादमी का यह प्रयास है कि संस्कृत में निहित सार्वभौमिक एवं सार्वकालिक ज्ञान-विज्ञान एवं जीवन दर्शन के साथ आज की पीढ़ी को जोड़ा जाये. इस सन्दर्भ में समय-समय पर सम-सामयिक विषयों पर सेमीनार का आयोजन करने का कार्ययोजना बनायी गयी है. इन सेमिनारों में इस बात की चर्चा करने की अपेक्षा कि वैदिक और उत्तर वैदिक काल में संस्कृत की स्थिति क्या थी, विशेष रूप से इस पर बात की जाएगी कि आज के समाज में जो समस्याएं, बुराइयाँ और निराशा की स्थिति है, उससे निपटने में संस्कृत की क्या भूमिका हो सकती है? रहन-सहन, खानपान, शिक्षा व्यवस्था, जीवनदर्शन, राष्ट्रवाद, सहअस्तित्व, स्त्री-पुरुष सम्बन्ध, आपदा, जलसंरक्षण, प्रकृति-पुरुष सम्बन्ध आदि अनेक बिन्दुओं पर संस्कृत में व्यापक विचार- विमर्श किया गया है. आवश्यकता इस बात की है कि नयी पीढ़ी के सामने नये कलेवर और विधियों-प्रविधियों के साथ इस विमर्श को उपस्थित किया जाये. हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि कथ्य की सम्प्रेषणीयता भाषा की पहली शर्त है. कहीं संस्कृत भाषा को हम इतना अधिक कुलीनता के सिंहासन पर तो नहीं बैठाये हुए हैं कि अन्य भाषाओं के साथ उसका कोई तालमेल ही सम्भव नहीं है. यदि ऐसा है तो हम मात्र यह कहकर अपने को संतुष्ट करते रह जायेंगे कि ‘संस्कृत समस्त भाषाओं की जननी है', अरण्यरोदन के सामान हमारी बात सुनने वाला कोई नहीं होगा. यदि बहुसंख्यक की भाषा में हम संस्कृत के साहित्य और दर्शन का प्रचार-प्रसार नहीं करेंगे तो संस्कृत की यात्रा समय के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल पायेगी और परिणाम वही होगा, जिसका कुछ-कुछ दर्शन हमें अभी हो रहा है. अकादमी द्वारा आयोजित सेमिनार में वक्ताओं को भाषा के स्तर पर कोई समस्या नहीं होने दी जाएगी, वे संस्कृत में निहित ज्ञान-विज्ञान को किसी भी सुबोध्य भाषा और तकनीक के माध्यम से लोगों के समक्ष रख सकते हैं.



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